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शनिवार, 10 जनवरी 2026

4618... विश्व हिंदी दिवस


शनिवारीय अंक में
आपसभी का हार्दिक अभिनन्दन।
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आज का अंक सामान्य  दैनिक अंक से
कुछ अलग है कृपया 
पढ़े और प्रतिक्रिया लिखकर हमारा उत्साहवर्धन करें।



10 जनवरी 1975 को नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की वर्षगांठ के रूप में विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है, जिसने हिंदी के वैश्विक अभियान की नींव रखी थी। जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप स्थापित करना और विश्व भर में इसके प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता पैदा करना है 2026 में भी यह दिवस वैश्विक स्तर पर हिंदी की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करने के लिए मनाया जा रहा है। 
विश्व हिंदी दिवस दुनिया भर में हिंदी के प्रति सम्मान और प्रेम पैदा करने का एक माध्यम है। यह दिन इस तथ्य को उजागर करता है कि हिंदी अब केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक भाषा बन चुकी है।
आइए कुछ परिचित - अपरिचित 
 अंतर्राष्ट्रीय लेखक जिन्हें हिंदी साहित्य का 
संवाहक माना जाता है


डॉ,तोमियो मिजोकामी एक प्रसिद्ध लेखक और भाषाविद् हैं तथा हिंदी और पंजाबी भाषाओं के विशेषज्ञ हैं। जापान में भारतीय साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देने में उनके योगदान के लिए डॉ. तोमियो मिजोकामी को 2018 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी जापान में हिंदी और भारतीय भाषाओं के सबसे प्रमुख संवाहक माने जाते हैं। विश्व हिंदी दिवस 2026 पर भारत यात्रा के दौरान उनकी उपस्थिति से उम्मीद लगाई जा रही है कि इससे भारत–जापान सांस्कृतिक संबंधों से नई मजबूती मिलेगी। हिंदी, पंजाबी सहित छह से अधिक भारतीय भाषाओं पर उनका शोध और अध्यापन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। उनका जीवन यह प्रमाण है कि हिंदी भाषा देशों और संस्कृतियों को जोड़ने वाली एक सशक्त सेतु है।
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डॉ. हेंस वर्नर वेसलर जर्मनी मूल के हिंदी विद्वान हैं तथा संप्रति भाषा विज्ञान एवं वांग्‍मय संस्‍थान, उप्‍साला विश्वविद्यालय, स्‍वीडन में प्रोफ़ेसर हैं। दक्षिण एशिया वांङमय एवं भाषा विज्ञान की परंपरागत शिक्षण शैली को निरंतरता प्रदान करने एवं आधुनिक दक्षिण एशियाई भाषा एवं संस्‍कृति पर अनुसंधान से संबद्ध हैं। इनकी अध्‍ययन पृष्‍ठभूमि भारत-विज्ञान (Indology) रही है, किन्‍तु पिछले कई वर्षों से आपने भारत एवं पाकिस्‍तान में हिंदी एवं उर्दू साहित्‍य तथा इन देशों के सांस्‍कृतिक इतिहास, धर्मशास्‍त्र एवं समाज के विभिन्‍न पहलुओं पर विशेष अध्‍ययन किया है। ये फ़ोरम फ़ॉर साउथ एशियन स्‍टडीज़ (एफ़.ए.एस. एस.) तथा यूरोपियन एसोसिएशन फ़ॉर साउथ एशियन स्‍टडीज़ (इ.ए.एफ़.ए.एस.एस.) के बोर्ड मेम्बर हैं।

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नार्वे में बसे हिंदी साहित्यकार डॉ. सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' की कई रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने हिंदी, उर्दू और नार्वेजियन भाषाओं में लिखा है। 


 हिंदी में उनके सात कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। चर्चित संग्रहों में 'प्रवासी का अंतर्द्वंद्व' (इसमें 61 कविताएँ हैं) और "लॉक डाउन" शामिल हैं।

 हिंदी में एक और उर्दू में एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है। उनकी एक कहानी 'विसर्जन से पहले' भी चर्चित है।

उन्होंने नार्वेजियन साहित्य का हिंदी में प्रचुर मात्रा में अनुवाद किया है, जिसमें हेनरिक इबसेन के नाटक ('गुड़िया का घर', 'मुर्गाब') और कुत हामसुन का उपन्यास ('भूख') शामिल हैं।

वे नार्वे में हिंदी की पत्रिकाओं 'परिचय' और 'स्पाइल' (दर्पण) का संपादन 21 वर्षों से अधिक समय से कर रहे हैं। 

उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और प्रवासी जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्ति देती हैं। उनकी कहानियों पर तीन टेलीफिल्में भी बन चुकी हैं। 


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ऊषा राजे सक्सेना एक सुप्रसिद्ध प्रवासी हिंदी लेखिका और कवयित्री हैं, जो वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम (UK) में निवास करती हैं। उनका जन्म 22 नवंबर 1943 को गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे पिछले कई दशकों से ब्रिटेन में रहकर हिंदी साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। 

उन्हें हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है:

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'विदेशों में हिंदी साहित्य सेवा सम्मान'

पद्मानंद साहित्य सम्मान

बाबू गुलाबराय स्मृति साहित्य सेवा सम्मान। 

उनकी कुछ कहानियाँ जापान के ओसाका विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी शामिल की गई हैं।


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मैंने सीमित नामों का उल्लेख किया है

कृपया आपकी जानकारी में और जो भी

नाम है उनके बारे में भी बताइये।

उम्मीद है आपको आज का अंक
कुछ अलग और ज्ञानवर्द्धक लगा होगा।
आज के लिए इतना ही

मिलते हैं अगले अंक में
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7 टिप्‍पणियां:

  1. आज हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रही, बल्कि डिजिटल दुनिया और इंटरनेट पर भी इसकी पैठ बढ़ी है, फिर भी इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिलना हमारी वैचारिक विडंबना का परिचायक कहें या कुछ और,,,,,

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत-बहुत आभारी हूॅं कविता जी।
      आपकी प्रतिक्रिया मन को राहत पहुंचा गयी कि रचनाओं के अतिरिक्त भी कुछ और जानकारी साझा की जा सकती है।
      सादर।
      कृपया साथ बने रहें।

      हटाएं
  2. श्वेता जी, सुबह-सुबह सरसरी नज़र से देखा उत्सुकतावश तो दिल से बेसाख्ता निकला .. वाह ! क्षमा कीजिएगा, दिन भर में अब पढ़ने और प्रतिक्रिया देने का अवसर मिला । आपने विश्व हिन्दी दिवस के अनुरूप दुनिया के अलग-अलग कोनों में हिन्दी प्रेमी विद्वानों/विदुषियों का परिचय दिया। वास्तव में इस जानकारी से यह प्रामाणिक अनुभूति होती है कि हिन्दी को चाहने वाले दुनिया भर में हैं। हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। अपने देश में भले ही हिन्दी थोपे जाने की राजनीतिक बहस होती हो.. पर वह एक अलग विषय है। तीसरे नंबर की भाषा, और एक भी नोबल पुरस्कार नहीं ? भाई-बहन सम्मान भी नहीं ? बचपन से ज्ञानपीठ द्वारा हिन्दी में अनूदित भारत की प्रांतीय भाषाओं का साहित्य पढ़ा और नोबल से सम्मानित साहित्य भी आंग्ल भाषा में पढ़ा । समझ में आया कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य इतना समृद्ध है कि उनकी थाह किसी ने पाई ही नहीं होगी। हिन्दी ने कई भाषाओं के शब्द अपनाए और अलग-अलग लहजों में बोली गई .. हिन्दी की सहजता और सरलता को सर विश्व अपना रहा है। हिन्दी अपनी तो है ही !

    हृदयतल से आपका आभार, श्वेता जी। यशोदा सखी बहुत प्रसन्न होतीं..

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय नूपुरं जी,
      सुबह से अनगिनत बार सूना कमेंट बॉक्स उदास करता रहा, यशोदा दी की बहुत याद आई अभी आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर बहुत- बहुत अच्छा लग रहा। साहित्यिक मंच सिर्फ रचनाएं प्रकाशित करने का माध्यम नहीं है अपितु साहित्य ज्ञानवर्धक विषयों को आदान-प्रदान करने का साधन भी होना चाहिए। मुझे बहुत निराशा और चिंता होती है दिन-ब-दिन पाठकों की ब्लॉग के प्रति अरूचि महसूस करके।
      सप्ताह में एक दिन किसी भी विषय पर पाठकों एवं चर्चाकारों के मध्य संवाद का कोई सूत्र होना चाहिए न।
      फिलहाल आपकी प्रतिक्रिया मुस्कान दे गयी ।
      सादर आभारी हूं।
      कृपया साथ बने रहे।

      हटाएं
  3. उत्तर
    1. आभारी हूं सर ,आप जैसे सजग, निरंतर सक्रिय चिट्ठाकार ही इस चिट्ठाजगत की अंतिम टिमटिमाती उम्मीद की रोशनी है ।
      सादर प्रणाम सर।
      कृपया स्नेह और साथ बनाये रखें।
      सादर।

      हटाएं
  4. प्रिय श्वेता, आप सबका आभार जता रही हैं पर वास्तव में तो हम आपके आभारी हैं . इस निरंतरता और समर्पण की भावना को मेरा प्रणाम . हमारा हिंदी दिवस हो या विश्व हिंदी दिवस, हम केवल शुभकामनाएँ देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे हैं कभी कभी मन में एक अपराध बोध सा महसूस होता है.
    आपने इस अंक में हिंदी साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले अंतर्राष्ट्रीय लेखकों और हिंदी का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार करने वाले महान साहित्यकारों से परिचित कराया जो प्रशंसनीय है, साधुवाद.

    जवाब देंहटाएं

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