शीर्षक पंक्ति; आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
कुछ प्रतिक्रियाओं के अनुसार Public Place में तो उन्हें ऐसी पोशाक पहननी ही नहीं चाहिए थी। ऐसी पोशाक उन महानुभावों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सवाल था।
तो फिर यही लोग देश की तमाम महिला Athlete और महिला तैराक के लिए Public Place पर किस तरह की पोशाक पहनने की सलाह देंगे भला ?
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एक प्रेम गीत लोकभाषा में-प्रेम के रंग
सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ
बाकी मुँह पर ताला हउवै
ई बाजारू प्रेम दिवस हौ
प्रेम क रंग निराला हउवै
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
मुँह पर तो कितना रस घोला जाता है,
जवाब देंहटाएंपीछे जाने क्या-क्या बोला जाता है।
सुंदर संयोजन
नए ब्लॉग मिले
आभार
वंदन
आभार, अनवरत को यहाँ शामिल करनेके लिए.
जवाब देंहटाएंसुप्रभात! लोक रंग से सजी सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंबहुत ख़ूब
जवाब देंहटाएंआपका हृदय से आभार
जवाब देंहटाएंजी ! .. सादर नमन आपको संग हार्दिक आभार आपका .. हमारी बतकही को इस मंच तक लाने के लिए ...
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