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शनिवार, 23 जून 2018

1072... जय हिन्द



पिछले दिनों अंडमान देखकर लौटी हूँ
डेग-डेग पर कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं
जुल्म की दास्ताँ सुन
रोंगटे खड़े करें
दहल उठे हम
और फिर...

मक्कारी का मुरब्बा और
मतलबपरस्ती का अचार ,
ले जाइए ,खाइये  -खिलाइये  .
खूब चलेगा आपका हर कारोबार /

                                        ठेका ,परमिट प्रमोशन
                                        और  पोस्टिंग 
                                         के कागजात
                                         समर्थन-मूल्य पर थोक भाव में 
                                         मिल जाएंगे इफरात 


संवेदना

यों कोसने परिस्थिति को, सौ बहाने हमने पाए हैं,
किंतु जूझने को अंधकार से, कितने कदम हमने उठाए हैं ?
———————————————————————
कहने को हर कोई कहता, राष्ट्र दुर्बल, अविकसित, अनुशासनहीन है,
पर अपने को क्या वास्ता, अपनी दुनिया तो रंगीन है ?
दिनों-दिन समाज में, लूट-बलात्कार-हिंसा बढ़ रहे,
और हम हाथों-पे-हाथ धरकर, अपनी बारी का इंतजार कर रहे ।



देश लूटते रहे

किसानों को सही मुआवजा नही
मजदूरों को ठीक से रोटी मकान नही
बेरोजगार पर सरकार सब चुप
जीओ जेसे कम्पनी देश फ्री बोल खुले आम लूट
नेताओं का भाषण सस्ता राशन
सब झूट सिर्फ कुर्सी उनका आसन




उन्होंने देश तो लूट ही साथ में आपसी फुट भी डाली।
 कई वीरों ने शहीद ... है तो बस चेहरा।
 इसी देश की दुर्दशा को पेश करती हुई
 हम आपके समक्ष रखने जा रहे हैं। ... 
भगवान के नाम पर लूट रहे, वेश धरा है जोगी का



चुने गये नेताओं द्वारा गढ़े जाने वाले खोखले चुनावी नारों की
जुमलेबाजी और सरकारों द्वारा लागू की जाने वाली  नीतियों और
 राजनीतिक स्टण्ट्स में क्या एक भी ऐसी नीति है जिससे मेहनत के
सहारे जीने वाली व्यापक ग़रीब जनता की जीवन परिस्थितियों में
 कोई सुधार होगा और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा भविष्य मिल सकेगा, 
जहाँ रोज़गार की अनिश्चितता न हो और हर एक व्यक्ति को 
एक सम्मानित जीवन जीने का मौक़ा मिले सके।


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अब बारी है हम-क़दम की
सरल सा विषय हम-क़दम का इसबार
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम चौबीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
अंकुर
उदाहरण...
सिर्फ प्रेम है और केवल प्रेम है
प्रेम न तो व्यापर है
न ही इर्ष्या और स्वार्थ
प्रेम तो है निश्छल और नि:स्वार्थ
प्रेम का एक ही नियम है
प्रेम... प्रेम... प्रेम...!
अंकुर फूटेगा एक दिन पुनः
क्योंकि यही जिंदगी का
नियम हैं।
-सुमित जैन

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना आज
शनिवार 23 जून 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
25 जून 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें

धन्यवाद

8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात दीदी
    सादर नमन
    बढ़िया प्रस्तुति
    आनन्दित हुई
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह्ह्ह...जबर्दस्त... लूट-माल...वाह्ह्ह..एक से बढ़कर एक रचनाएँ पढ़ने को मिली दी।
    हमेशा की तरह दी की उत्तम प्रस्तुति आनंद आ गया..।

    जवाब देंहटाएं
  3. आक्रोश खुला आक्रोश व्यवस्था के विरूद्ध, और स्वयं और हर देशवासी को कटघरे मे खडी करती यथार्थ और सटीक प्रस्तुति।
    आदरणीय दी की हर प्रस्तुति अनुठी और सत्य का खुला दर्पण।
    सभी रचनाऐं लेख जबरदस्त संदेश और विसंगतियों पर चोट करती अद्भुत।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह!!लाजवाब प्रस्तुति... सभी लिंक एक से बढकर एक ....।

    जवाब देंहटाएं

  5. आदरणीय दी की संदेश देती संकलन..
    बहुत बढिया।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति करण उम्दा लिंक संकलन...

    जवाब देंहटाएं

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