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रविवार, 13 सितंबर 2026

4864 .."एक रुपया नजराने का हुआ कि नहीं?"

 सादर अभिवादन

आज ज़रा सा ठीक नहीं न लग रहा


लगता है गलत समय पर यह कदम लिया गया
फिर भी अनुभव तो मिला
आभार ,
पर लघुकथा आएगी जरूर, हर माह दूसरे रविवार को प्रतीक्षा करते रहें
आज की रचनाएं अखबारों से ली गई है
देखिए रचनाएं....

विसर्जन


राजमहल में ‘गणेश उत्सव’ की तैयारी हर वर्ष की तरह ज़ोर-शोर से चल रही थी। राज्य के मुख्य मंदिर से निकाल कर मूर्ति को दालान में रखा जाता था और उसकी सार्वजनिक पूजा होती थी। दस दिनों के बाद उसे पुनः मंदिर में स्थापित कर दिया जाता था। सदा से ऐसा ही होता आ रहा था। किंतु इस बार देश का वातावरण बदला हुआ था। आज़ादी का संग्राम धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रहा था। यह ज़रूरी था कि सभी जातियों के लोग इसमें भाग लें। महामंत्री ने पेशवा से कहा, जनसैलाब उमड़ा चला आ रहा है, 




एक गांव में बारात जीमने बैठी. उस समय स्त्रियां समधियों को गालियां गाती हैं, पर गालियां न गाई जाती देख नागरिक सुधारक बाराती को बड़ा हर्ष हुआ. वह ग्राम के एक वृद्ध से कह बैठा,”बड़ी खुशी की बात है कि आपके यहां इतनी तरक़्क़ी हो गई है."
बुड्ढा बोला, “हां साहब, तरक़्क़ी हो रही है. पहले गालियों में कहा 
जाता था.. फलाने की फलानी के साथ और अमुक  का अमुक के साथ..
लोग-लुगाई सुनते थे, हंस देते थे. अब घर-घर में वे ही बातें सच्ची 
हो रही हैं. अब गालियां गाई जाती हैं तो चोरों की दाढ़ी में 
तिनके निकलते हैं. तभी तो आंदोलन होते हैं कि गालियां 
बंद करो, क्योंकि वे चुभती हैं."






"यह तो पांच ही हैं मालिक।”
“पाँच, नहीं, दस हैं। घर जाकर गिनना।"
"नहीं सरकार, पाँच हैं।"
"एक रुपया नजराने का हुआ कि नहीं?"





बादशाह ने उसकी कड़वी बातें सुनकर कहा— "उसका तो सिर्फ रंग-रूप ही बुरा है, लेकिन तुम्हारा तो मन कुरूप है। आज से मैं तुम्हें उसका अधीनस्थ (उसके नीचे काम करने वाला)
गुलाम बनाता हूँ।"

यह सुनकर वह गुलाम समझ गया कि यह बादशाह की परीक्षा थी, जिसमें वह असफल रहा। उसने अपनी गलती मानी और बादशाह से माफी माँगी।





रसोई में बर्तन समेटते हुए बेटी से पूछाः कॉलेज का फॉर्म भर दिया?
"हां"
'कौन सा कोर्स चुना'
"लॉ"
कविता के हाथ ठिठक गए, मां ने हैरानी से बेटी की ओर देखा
तुम तो इंजीयरिग करना चाहती थी न ..
चाहती तो थी मां पर अब कानून पढ़ूंगी





'मेरे लिए ?' मै हैरान था ,हां आपके ही लिए तो। आप इस फ्लैट में अकेले रहते हैं।आपकी उम्र लगभग 80 बरस की है, हम अपना दरवाजा इसलिए खुला रखते हैं ताकि यह पता लगता रहे कि कोई गलत इंसान तो आपके यहां नहीं आया आपके कोई परेशानी या दिक्कत तो नहीं और जरूरत पड़ने पर हम आपकी मदद कर सकें

सादर समर्पित
वंदन

शनिवार, 12 सितंबर 2026

4863...अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं...


शीर्षक
 पंक्ति: आदरणीय अशरफी लाल मिश्र जी रचना से। 

सादर अभिवादन। 

शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ- 

भार्गव राम खण्डकाव्य - 58

अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,

अब थी निराश काशी नरेश बाला।

अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,

नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।

*****

810. प्यार (10 हाइकु)

कुछ बन्धन  
हँस-हँस के जीते 
गर प्यार हो। 

4.
ज़ख्म फूलों से 
प्यार में मिलता है 

नादान हूँ न!
*****

सूखी बारिश 

कहीं और सूरज वैसे निकलता ही नहीं।
चाँद में वह ख़ूबसूरती कहीं और नज़र ही नहीं आती।
खाने में वह ज़ायका नहीं मिलता,
बातों में वह बात नहीं होती,
और हँसी में वह खिलखिलाहट नहीं घुलती।

*****

स्तुति

और याद है

आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को कैसे मारा था?

उस दिन के तो क्या ही कहने

आप अकेले ने दस-दस को गिराया था

तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा

*****

तुम्हारे बारे में

आज सुबह नौ बजे वे नन्हे के घर जाने के लिए रवाना हुए। शाम को साढ़े छह बजे घर लौटे। एक अनुवाद कार्य किया। कल छोटी बहन का जन्मदिन है, एक पुरानी कविता को आज के परिप्रेक्ष्य में दुबारा लिखा। दिन में दोपहर बाद एक दूसरा हिन्दी नाटक देखा, ‘तुम्हारे बारे मेंमानव कौल द्वारा लिखित और निर्देशित भी।आधुनिक काल में स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर आधारित है। सोनू को लेखक से मिलने का बहुत मन था, उसने मानव कौल के साथ तस्वीर भी खिंचवाई। 

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

4862.... चिड़िया की ऑंख छलकती रही

शुक्रवारवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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तुलसीदास जी की लिखी पंक्तियॉं- 

​"भादों नदीं जल जाहिं सुहाई।

खल बल पाइ करहिं प्रभुताई॥

भूमि परत भा ढाबर पानी।

जनु जीवहि माया लपटानी॥"


अर्थात्: भादों के महीने में नदियाँ उमड़कर चलती हैं, जैसे नीच व्यक्ति थोड़ा-सा बल (धन-दौलत) पाकर अपनी प्रभुता दिखाने लगता है। और जैसे वर्षा का जल पृथ्वी पर गिरते ही मटमैला हो जाता है, ठीक वैसे ही जीव पृथ्वी पर जन्म लेते ही माया से लिपट जाता है।

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आज की रचनाऍं-

रवींद्र जी

​आप ने दृश्य और भाव बिंबों का ऐसा सूक्ष्म ताना-बाना बुना है कि  पाठक न केवल उस हादसे को अपनी आँखों से घटते हुए देख रहे है, बल्कि उस 'बीमार दिन' की तड़प को अपने भीतर महसूस भी कर रहे है।



लँगड़ाती हुई सुबह   
अंधी होकर ढली धूप
कोलाहल से बहरी हुई रात 
निष्ठुर हो गुज़रती रही
लाश पर लाश गुज़रती रही 
दिन की तबियत बिगड़ती रही 
चिड़िया की आँख छलकती रही

 

हरीश कुमार जी आपकी रचना में जीवन के शाश्वत सत्य, वक़्त के परिवर्तनशील स्वभाव और मानवीय गरिमा को आपने एक बेहद खूबसूरत और विचारोत्तेजक काव्य में पिरोया है।


जो आज झुककर तुम्हारे सामने खड़े हैं,
कल वही आसमानों के ख़्वाब भी हो सकते हैं।
जिन्हें तुमने समझा है कमज़ोर और नाकारा,
कल वही किसी रियासत के नवाब भी हो सकते हैं।

हर शख़्स की कहानी कहाँ चेहरे से पढ़ोगे,
यहाँ हर चेहरे के पीछे कई नक़ाब भी हो सकते हैं।
जिन आँखों में आज नमी दिखाई देती है,
कल उन्हीं आँखों में ख़ुशियों के सैलाब भी हो सकते हैं।


डॉ. सुनील के. "ज़फ़र" आपकी यह रचना बिछोह, अपनी यादों के स्थायित्व और अतीत के प्रति अनसुलझे लगाव की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है। रिश्ते टूट जाने और जीवन में बदलाव आ जाने के बावजूद, हृदय की गहराई में पुराने प्रेम की महक और मिठास आज भी रची-बसी है।

तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो 
किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,

डर लगता है इन नई हवाओं में
उस पुराने सज़र का दिल तलबगार बाक़ी है ,

अनिता जी आपकी डायरी के पन्नों  में लिखी गई एक अत्यंत आत्मीय और चिंतनशील अभिव्यक्ति है, जिसमें  आपने दैनिक जीवन के अनुभवों, कला, साहित्य और मानवीय संबंधों के गहरे पक्षों को उजागर किया है।


वरिष्ठ साहित्यकार व कलाकार अपने में इतने सघन होते जाते हैं कि सारे जग का दर्द मिटाने की भावना उन्हें चैन से बैठने नहीं देती। उनका अपना स्वार्थ नहीं होता फिर भी कुछ लोग समाज के लिए दिन-रात प्रयत्न करते हैं। ऐसे ही लोगों के बल पर यह दुनिया और खूबसूरत बन जाती है। वे थके हारे लोगों के दर्द भी महसूस करते हैं और महिलाओं की पीड़ा को भी शब्द देते हैं।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 10 सितंबर 2026

4861 घूमते घूमते भूल जाता है घूमना है उसे

सादर अभिवादन
पसंदीदा रचनाएं



यदि आप 
किसी से ऐसी बात करें कि
आप कितने शक्तिशाली हैं
आपकी आँखें कितनी सुंदर हैं
आपकी भुजाओं में कितना दम है
आपके कान के तो क्या ही कहने
आपकी गर्दन तो बस देखते ही बनती है




आदमी
घूमता है तारा बन
अपने ही बनाये सौर मण्डल में

घूमते घूमते भूल जाता है
घूमना है उसे
अपने ही सूरज के चारों ओर





अगर किसी छात्र को एक कोर्स के लिए 33 अलग-अलग रीडिंग्स पढ़नी हैं, तो अलग-अलग किताबों से उन्हें इकट्ठा करने में कई महीने लग सकते हैं। मैं सारी सामग्री एक ही पैक में देकर छात्रों का काम आसान करता हूं।

उन्होंने अदालत से मांग की कि दुकान को कॉपीराइट वाली सामग्री की फोटोकॉपी करने से हमेशा के लिए रोक दिया जाए।





मेल -जोल बैठकी नदारद
बिरहा, कजरी, कव्वाली
हलुवा, पूरी के प्रसाद से
वंचित डिह, माता काली
घर में टी वी चैनल, बाहर 
बिग बजार औ मॉल बा





भावनाओं की नींद का 
अचानक टूटना 
आंखों का खुल जाना 
और खुद को पाना 
एक खुरदुरी चट्टान पर 
खिले एक ज़िद्दी फूल की तरह 
एहसास कराता है 
उस मिथ्या का 






चंचलता  चित्त  की  चमक   सुहाती
ज्योतिपुँज  की  गहराई  में  डूबी 
केसरी  कुँज   श्वेतमय   पारिजात  प्रिय
सर्मिपत  हो  जाना  पूर्ण  रुप  में
खुले  दिल  से  अपनी  सुरभि  को
लहलहाना  ,  क्षुब्ध  मन  को  मिले  जो  विश्राम 
पथिक  की आशा - निराशा अंतर्द्वंद  को  आराम


चलते -चलते एकअंतिम प्रयास
लघुकथा/कविता का चौथा अंक
नया विषयः  गणपति उत्सव, और  जगराता, व्रत  
प्रेषण तिथिः 11 सितम्बर 26
प्रकाशन तिथिः 13  सितम्बर 26


सादर समर्पित
वंदन


बुधवार, 9 सितंबर 2026

4860..गुलज़ार बाक़ी है

।।भोर वंदन।।

 "लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से

बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से

आदत न रही कुछ लिखने की

निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से

कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम

मेरा धन है स्वाधीन कलम"

गोपाल सिंह नेपाली

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए...✍️

अच्छा है पर कभी कभी

बड़े - बुजुर्गों को समझाना, अच्छा है पर कभी कभी 

बच्चे को भी आँख दिखाना, अच्छा है पर कभी कभी 

ज्ञान - वमन अक्सर वो करते, जिनका ज्ञान अधूरा है 

ज्ञानवान का चुप रह जाना, अच्छा है पर कभी कभी ..

✨️

किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है..

 दर्द की तह में गुलज़ार बाक़ी है

मेरे ज़िगर में ख़ुशबू ए यार बाक़ी है 

तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो 

किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,..

✨️

दास्तान -ए-MRI!

 अब बहुत दिन हो गए, काफी समस्याएं जल्दी शुरू हुई थी लो ब्लड प्रेशर से चक्कर आना। इससे ही समस्याएं बढ़ी। 1 2 3 4 डॉक्टर को दिखाया न्यूरो सर्जन, न्यूरो फिजिशियन, ई एन टी और फिर फिजिशियन। सबका ट्रीटमेंट चल रहा था, 

✨️

घर में रहते घर ढहते, 

बाहर जाते पुल ढहते,

सड़कें धँसतीं, गड्ढे हँसते, 

वो केवल ‘फू-फा’ करते!

✨️

दोस्त बन के आइए 

कभी दोस्त बन के आइए 

जिगर में ही समाइये 

कसक सी उठती है दिल में 

यूँ न हमें आज़माइए 

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '


मंगलवार, 8 सितंबर 2026

4859...दायरा समझ गये

मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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​प्रकृति कभी स्वार्थी नहीं रही; उसने हमेशा जीवन का पोषण किया है। लेकिन जब मनुष्य उसके धैर्य की सीमा लांघ जाता है, तो संतुलन बनाने के लिए प्रकृति अपना रूप बदलती है। ये प्रलयंकारी आपदाएँ वास्तव में मानव सभ्यता के लिए एक अंतिम चेतावनी हैं। यदि हमने अब भी अपनी जीवनशैली, लालच और प्रकृति के प्रति अपने रवैये को नहीं बदला, तो आने वाली नस्लों के लिए अस्तित्व का संकट और गहराता जाएगा।

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आज की रचनाऍं मेरे अंदाज़ में-




भोर की किरणें 

मद्धम और शांत संगीत की तरह है

जिसकी स्वर्णिम आभा में बहती गुनगुनाहट को

केवल एकाग्र और शांत मन से ही

महसूस किया जा सकता है।

​परंतु, दिन की आपाधापी,

दौड़-भाग और कोलाहल में

आत्मा को तृप्त करने वाली  मधुर ध्वनि

कहीं लुप्त हो जाती है।

​फिर जब ढलती शाम के धुंधलके में

सृष्टि का कोलाहल शांत होने लगता है,

तब वही नीरवता चुपके से पास आकर

जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाती है—

​कि कुछ पाने और हासिल करने की लालसा में

हम निरंतर भागते तो रहते हैं,

किंतु जीवन का वास्तविक आनंद, सत्य और सार

केवल भागने में नहीं,

बल्कि अंततः ठहर जाने और शांत हो जाने में ही है।

​ज्ञान की पहली सीढ़ी यही है कि 

हम अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर लें,

 जो बीत गया वह विधि का विधान था,

किंतु आने वाला कल अब भी हमारे संकल्पों के अधीन है।

​यदि मन में जानने की सच्ची तड़प हो

और जीवन में त्याग का भाव समाहित हो,

तो समय का हर क्षण एक नया मार्गदर्शक बन जाता है।

​बहती नदी की भांति निरंतरता ही

मन और चरित्र को निर्मल बनाए रखती है;

जहाँ निष्काम भाव से कर्म करते हुए

परिणामों को ईश्वर अथवा समय के

 चरणों में सौंप दिया जाता है।

इस निष्काम कर्म तथा निस्वार्थ समर्पण की नींव

केवल और केवल 'प्रेम' ही हो सकती है,

क्योंकि प्रेम के बिना सच्चा समर्पण संभव ही नहीं।

हमारी खामोशी को गलती मान लिया गया,

असल में हम इस दुनिया का दस्तूर और चालाकी बहुत जल्दी समझ गए।

​जब महफिल में हमारा परिचय हो रहा था,

तब किसी खास की  चुप्पी  

असलियत बयान कर गई।

​हमने हमेशा अपनी सीमाओं को स्वीकार किया ,

क्योंकि हम खुद को असीम दरिया नहीं,

बल्कि एक सीमित दायरा में रहने वाला इंसान मानते हैं।

​सिर्फ़ वाह-वाही और तारीफ पाने के लिए नहीं लिखी 

कभी हमने दास्तां अपनी 

आपने हमारी आत्मा की पुकार को महज एक मुशायरे की नुमाइश समझ लिया।

​हम तो बस कुछ पल के लिए क़लम बदलने ओझल हुए थे,

और आपने इतनी ही देर में हमें हमेशा के लिए लापता मान लिया।

अक्सर परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव या समय की विपरीत चाल में जो लोग लापरवाह होते हैं, वे संयोगवश सफल और सही दिखाई देने लगते हैं, जबकि अपनी जिम्मेदारी और नियमों का ईमानदारी से पालन करने वाले लोग असमंजस में पड़कर असफल या बेवक्त साबित हो जाते हैं।

​किंतु दुनिया का यह अन्याय या अनिश्चितता हमारे सिद्धांतों को बदलने का आधार नहीं बननी चाहिए। बाहरी परिणाम और दुनिया की सराहना चाहे जैसी भी हो, व्यक्ति को समय की कद्र, अपनी जिम्मेदारी और अपने नैतिक मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए। सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर बने रहना ही जीवन का वास्तविक धर्म है।

मिट्टी की सोंधी महक महसूस करना

अपनी जड़ों की ओर लौटते मन की एक पुकार है,

जहाँ प्रकृति के आंगन में खिलते जीवन की रंगत

और समाज की विविध परतों का सच सिमटा हुआ है।

​इंसानी रिश्तों के अनसुलझे ताने-बाने,

दिलों में पनपते प्रेम, करुणा और संघर्ष के भाव,

और बदलती दुनिया के बीच

मेरी माटी तेरा मोह न छूटे वाली

अनवरत तड़प

​इस जीवन का हर एक पृष्ठ

मनुष्य के व्यवहार और स्वभाव का दर्पण है,

जो यह याद दिलाता है कि इंसान

चाहे कितना भी उड़ ले,

उसकी आत्मा का अंतिम विश्राम

अपनी ही माटी के आँचल में है।


-श्वेता



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

4858...इतनी बजे बाद यह मत किया करो...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में आज पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

आ गईं दिवस इक देवि  गंगा,

था साथ में उनका पुत्र देवव्रत।

कर रही प्रार्थना अब  गंगा थी,

भगवन! शिष्य बना लो देवव्रत।।

*****

वफ़ादारी

पर इतना ज़रूर है

कि वफ़ादार

एक किरायेदार है

जिसे मकान मालिक

कभी भी निकाल सकता है

किराया बढ़ा सकता है

यहाँ यह मत करो

वहाँ ये मत करो

इतनी बजे बाद यह मत किया करो

50 प्रतिबंध लगा सकता है

*****

शिक्षक दिवस पर शुभकामनाएँ

परम कृपा के हम अभिलाषी

वाणी मधुर, शुद्ध हो जाये,

भाषा का विकास हो प्रतिपल

शब्दों में भी मौन समाये!

*****

राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक

 'मालविकाग्रिमित्रम' नाटक में महाकवि कालिदास ने कहा हैं-
लब्धास्पदोऽस्मीति विवादभीरोस्तितिक्षमाणस्य परेण निन्दाम्।

यस्यागमः केवल जीविकायां तं ज्ञानपण्यं वाणिजं वदन्ति।। "

- अर्थात जो अध्यापक नौकरी पा लेने पर शास्त्रार्थ से भागता है, दूसरों के अंगुली उठाने पर चुप रह जाता है और केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ाता है, ऐसा व्यक्ति पंडित (शिक्षक) नहीं वरन् ज्ञान बेचने वाला बनिया कहलाता है। लेकिन दुःखद पहलू है कि आज ज्ञान से पेट भरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा नजर आती है। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस तीव्र गति से विद्यालयों की संख्या बढ़ी उस अनुपात में शिक्षा का स्तर ऊँचा होने के बजाय नीचे गिरना गंभीर चिन्ता का विषय है।

*****

 असली ताकत ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि..

इसलिए जीवन में न तो अपनी तारीफ सुनकर घमंड करना चाहिए और न ही किसी को इतना सिर पर चढ़ाना चाहिए कि वह दूसरों को छोटा समझने लगे। असली ताकत ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, संयम और विनम्रता में होती है। जो लोग खुद को साबित करने के लिए शोर नहीं मचाते, उनका खामोश आत्मविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनता है।

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव