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रविवार, 26 अप्रैल 2026

4724 ..जादुई किताबें ! बारहखड़ी सिखातीं । शब्द ज्ञान करवातीं

 सादर अभिवादन


नूतन रचनाएँ




किराने की  दुकान  तक  का  
एक  और  सफर  तय  होता  है 
हाथ  में  झोला  लिए  
पैदल  आने - जाने  तक  का सफर
ग्यारह  नंबर  की  सवारी  
और  उकताते  दिन  की  
तब्दीली  का   बहाने  लिए  हुए ।




किताबों की कई किस्में
पाई जाती हैं दुनिया में ।
बचपन की रंग-बिरंगे

चित्रों वाली जादुई किताबें !
बारहखड़ी सिखातीं ।
शब्द ज्ञान करवातीं ..





तुम जो मिलते हो ख्यालों में धूप आती है 
यूं पास रहते तो हवाएं भी चुप लगाती है 
गुनगुनाने लगे इस झील का पानी ऐसे 
जैसे नदियां ज्यों पहाड़ों से उतर आती है 
रंग फूलों का भी खिल के निखार आता है 





मैं हमेशा एक पहेली थी 
अब भी हूँ आगे भी रहूंगी 
मुश्किल है समझ पाना मुझे 
जो भी मिला उसके साथ हो लिए 
जो छूट गया पीछे उस पर रोये नहीं कभी 
जिसने अपना बनाया 





"मैडम, आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की?...??
अध्यापिका ने कहा, "पहले एक कहानी सुनाती हूं।" उसने कहा, "एक महिला को बेटे की लालसा में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसे धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छा अनुसार बेटा पैदा कर दे। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो-रोकर दुआ करती रही...!!


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

4723...बाहर खेल रहे रेणुका नंदन, साथ था छौना वनराज का...

 शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ शनिवारीय अंक में-

भार्गव राम -2

बाहर खेल रहे रेणुका नंदन,

साथ था छौना वनराज का।

एक क्षण थी मातु अचंभित,

सचमुच  छौना वनराज का?

*****

घौर बौड़ि आ, बेटा! | पलायन की पीड़ा और अपनों का इंतज़ार

छोटा भाई तेरु दिनभर खटदु,
ब्याखुनि नशे मा धुत्त ह्व़े आवै।
कैकू बि ड़र-धौंस नी च अब,
नशे मा अपणु परिवार भुलावे।
भुलि ग्यों ऊं घर की मर्यादा,
ह्व़े ग्युं छार-छार यो परिवार च,
सारु घौर आज बीमार च।,

*****

द्वारका-सोमनाथ

इसके बाद हम गीता भवन मंदिर गए। कृष्ण और राधा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित थीं। यहां पर अठारह खंभों पर भगवद्गीता के अध्याय अंकित हैं।यह मंदिर भी गोमती नदी के तट स्थित है।यह बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।इसे बिरला परिवार द्वारा बनवाया गया था।इसके अलावा हमने सिद्धेश्वर महादेव मंदिर और पंचमुखी हनुमान मंदिर के भी दर्शन किए।ये पल आध्यात्मिक चेतना और परमानंद की अनुभूति कराने वाले थे।

*****

साजिश

"बैठो प्रिया, हड़ताल खत्म हो गयी है, मजदूरों को हड़ताल अवधि का वेतन एडवांस रूप में भी मिल गया है, वे फिर से काम पर हैं. फैक्ट्री को बंद करने की अनुमति के आवेदन की सुनवाई में प्रबंधन पूरी तरह नंगा हो गया है. फिर भी मजदूरों के हाथ में जो वेतन वही ट्रक सिस्टम वाला है जिससे छुटकारा पाने और फेयर वेजेज प्राप्त करने के लिए उन्होंने लड़ाई शुरू की थी.

*****

पुराणों के अनुसार जल दान- देयं जलं प्रपेषु शीतलं पावनं शुभम्। तर्षार्तानां च जीवानां भवेत् प्राणाभिराक्षणम्॥

प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा धर्म

है। कहते हैं कि जल ही जीवन है। गर्मी बहुत पड़ रही है, जल पिलाएं, जीवन बचाएं। मानव के साथ पशु-पक्षियों के लिए भी जल की व्यवस्था करें। यह करके देखिए; आपको अच्छा लगेगा।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

4722 ..विदा होता अप्रैल कुछ-कुछ कहता है

 सादर अभिवादन



विदा होते मास की प्रकाशित
रचनाएँ



प्रज्ञा की सुंदर बेलें  हो, 
दृढ़  इच्छाओं के वृक्ष लगे,
धार प्रेम की बहती जाये 
मेधा,प्रज्ञा की ज्योत जगे !






और फिर
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार
धीरे-धीरे
विलुप्त होते गए।

अब बची हैं बस
उनकी कहानियाँ,
कुछ दुर्लभ किस्से—
जिन्हें सुनकर
लोग मुस्कुरा देते हैं,
मानो कोई कल्पना हो।





द्वैत नहीं, वो इक अद्वैत,
बस, बांट जाती है, उन्हें अनुभूतियां,
अतिरंजित कर जाती हैं, चेतना,
यूँ, बढ़ जाते हैं संशय,
बनती जाती है, अतिशयोक्ति!





मेरी कविताओं का शीर्षक कुछ भी हो
लेकिन वो जीती हैं अपनी ही शर्तों
के तहत, मेरे जीवन का गंतव्य
अज्ञात सही, बियाबान से
लेकर समंदर तक मुझे
तलाश है एक अदद
सुकून की अपने
अंदर तक,
अपनी
ही शर्तों के तहत ।





प्रशांत बाबू उसका सवाल सुन कर मुस्कुराए, “तुम बहुत होशियार हो, एकदम सही बिन्दु पर 
पहुँच जाती हो प्रिया. वे एएसएल के सामने कल यह कह सकते हैं 
कि 'देखिए, हमने तो मजदूरों को एडवांस दे दिया है, हम उनके भले की सोच रहे हैं, 
लेकिन घाटे के कारण अब हम चला नहीं सकते'. 
वे अपनी छवि सुधारने की कोशिश करेंगे. लेकिन हम कल उन्हें इस जाल में नहीं फंसने देंगे. 
कल हमें यह साबित करना ही होगा कि क्लोजर का आवेदन केवल एक ढोंग है."

सादर समर्पित
सादर वंदन
रचनाए

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

4721 ..एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था।

 सादर अभिवादन

आज के अक की रचनाएं..



"जब से न्यायालय का निर्णय आया है
मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है
यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,
नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"




नारियल की चटनी सी सादगी भरी बात,
सांभर की गर्माहट में अपनापन साथ।
केले के पत्ते पर सजा ये सादा सा स्वाद,
भीड़ भरी दुनिया में जैसे अपना सा संवाद।




शायद एक समंदर छुपाए थी, 
हम पढ़ते रहे केवल अंकों को, 
वो सिसकियाँ दबाए थी




मन वीणा की तान सुनी तो 
सुर ताल सजी बगिया महकी।
पवन बसंती के छूते ही 
आशा रूपी चिड़ियाँ चहकी।
ओढ़ चुनरिया बिंब रूप में 
निखरी कविता की तरुणाई॥ 




द्वारकाधीश मंदिर के समीप ही होटल था हमारा। नहा-धोकर हम श्री द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़े पर वहां बहुत भीड़ थी। लंबी-लंबी कतारें लगी थीं।
हम भी कतार में खड़े हो गए। यहां सुरक्षा के बहुत इंतजाम थे।आप कोई सामान अंदर नहीं ले जा सकते।मंदिर दूर से ही दिखाई दे रहा था।उसपर लहराता ध्वज सनातन धर्म की दिव्यता का संदेश दे रहा था। 
यहां पर दो द्वार हैं।स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार।जब हम मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे तो पता चला कि हम मोक्ष द्वार से अंदर आए हैं।तो स्वर्ग द्वार कहां है....?
पता करने ज्ञात हुआ कि स्वर्ग द्वार गोमती घाट के पास स्थित है और वहां छप्पन सीढ़ियां हैं जिनको पार कर मंदिर में प्रवेश किया जाता है




स्वामी रामतीर्थ  जापान गए। जिस जहाज पर वह थे, एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था। अब चीनी भाषा सीखनी बहुत कठिन बात है। शायद मनुष्य की जितनी भाषाएं हैं, 
उनमें सबसे ज्यादा कठिन बात है। क्योंकि चीनी भाषा के कोई वर्णाक्षर नहीं होते, 
कोई क ख ग नहीं होता। वह तो चित्रों की भाषा है। इतने चित्रों को सीखना नब्बे वर्ष की उम्र में! 
अंदाजन किसी भी आदमी को दस वर्ष लग जाते हैं ठीक से चीनी भाषा सीखने में।


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

4720..खामोशी जो सब कह गई ..

।।प्रातःवंदन।।

 "है वहाँ कोई चल रहा है

कभी आगे कभी पीछे

कभी मेरे बराबर पर।

सुबह की फूटी किरन

बस पास मेरे

है उजाला औ' क्षणिक

उल्लास मेरे ..."

दूधनाथ सिंह


जीवन के गहन रूप को इंगित करती पंक्तियों संग नज़र डालें लिंको पर..

फासलों के उस पार....



अब रोज़ तुझसे गुफ़्तगू कहाँ मयस्सर होती है,
मगर हर साँस में तेरी ही ख़बर होती है।
सच कहूँ, दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है,
रात की हर चुप्पी तेरे नाम बसर होती..

✨️

आपदा में अवसर !

                                 बहुत दिनों से देखते चले आ रहे है कि प्राकृतिक आपदा हो या फिर मानव जनित - लोगों को कमाई के अवसर मिलने लगते हैं। भौतिक रूप से मिला तो लोगों ने संचयन करना शुरू कर दिया, ताकि आगे चलकर उसको ब्लैक में बेचकर धनवान बना जा सके। इस काम से आम आदमी के लिए संकट पैदा होने लगता है। यहाँ तक तो ..

✨️

खामोशी जो सब कह गई | अनकही भावनाओं की भावुक हिंदी कहानी

​"शब्दों की एक सीमा होती है, पर संवेदनाएँ असीम हैं।"

​अक्सर हमें लगता है कि मन की उलझनों को शब्दों के धागे में पिरोकर बाहर निकाल देने से हृदय का बोझ कम हो जाएगा। हम सोचते हैं कि कह देने से मन खाली हो जाएगा। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होता है ? ..

✨️

सुनो, पता है तुम्हें

सुनो 

पता है तुम्हें 

कोई-कोई इंसान 

किसी के लिए बोझ हो जाता है 

कुछ को नापसंद हो जाता है 

और 

बहुतों की आंखों की किरकरी बन जाता है. ..

✨️

तनाव

तनाव

हिस्सा है

जीवन का

प्रकृति का

कल्पना का

सोच का..

।। इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

4719,..राह से जीवन बना रे....

 सादर अभिवादन

21 अप्रैल ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 111वॉ (लीप वर्ष में 112 वॉ) दिन है। 
साल में अभी और 254 दिन बाकी है।
 आज राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस है

रचनाएं ....




राह  कुछ  गाती  रही  है  
राह  तो  साथी  रही  है 
राह  में  अनुभूतियां  है 
राह  से  जीवन  बना  रे





मिट्टी की सोंधी महक में,
छुपा है अपनापन सारा,
ये चाय नहीं, एक रिश्ता है,
जो हर बार लगे दोबारा




जो कला, संस्कृति, परंपरा,सृजन
स्मृति में चिन्हित हो चुका है,
हमारा परिचय बन चुका है,
सदियों से समय के झंझावत
झेल कर भी टिका हुआ है,
वह हमारी अमूल्य धरोहर है ।



तो फिर ..
नौ माह ना सही,
नौ सप्ताह तक ही 
गर्भ संभालने वाली 
श्वान माँओं (कुत्तियों) में भी तो 
होते ही होंगे ना भगवान ? 
है ना ? .


अनुभव, ना हो महज कोरा,
छुअन, ना हो सिर्फ कल्पनाओं में पिरोया,
और, मूर्त कहीं, हो जाए, सत्य,
मधुर, लगे ये स्पंदन!




सुनहरी सी ये डाल, 
जैसे विषु का पैगाम है,
कोन्ना के फूलों में बसता 
केरल का हर अरमान है।
सुबह की पहली किरण संग, 
जब ये आँगन में सजता है,
हर घर के कण-कण में तब, 
खुशियों का ऐलान है।




1. यदि उत्पादन बंद था, तो क्लीन रूम को मेंटेन करने के लिए बिजली की खपत 'पीक' पर क्यों थी?

2. स्टॉक रजिस्टर से गायब हुए 5,000 सिलिकॉन वेफर्स का विधिक स्पष्टीकरण क्या है?

3. क्या 'वेस्ट डिस्पोजल' के नाम पर असल में तैयार IC को फैक्ट्री से बाहर भेजा गया?

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की लाइट जल रही थीं. उसे यकीन हो गया कि कल की 
जिरह केवल एक विधिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की स्थापना होगी 
जिसे प्रबंधन ने फाइलों के नीचे दबा रखा था.


सादर समर्पित
सादर वंदन

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

4718 ..वह खाना इतना अच्छा बनाती थी कि उसके हिस्से में तारीफ़ आती थी

 सादर अभिवादन

रविवार, 19 अप्रैल 2026

4717...सब दर्शन को थे लालायित, प्रथम दर्शन हों शिशु राम के...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

भार्गव राम

जब जाना ऋषियों मुनियों ने,

भीड़ जुटी  ऋषि आश्रम पर।

सब दर्शन  को थे  लालायित,

प्रथम  दर्शन हों शिशु राम के।।

*****

'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख)

चंदर सुधा से प्रेम तो करता है, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए अहसान और व्यक्तित्व पर हावी उसके आदर्श कुछ ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि वह चाहते हुए भी कभी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता। सुधा की नजरों में वह देवता बने रहना चाहता है और होता भी यही है। सुधा से उसका नाता वैसा ही है, जैसा एक देवता और भक्त का होता है। प्रेम को लेकर चंदर का द्वंद्व उपन्यास के ज्यादातर हिस्से में बना रहता है। नतीजा यह होता है कि सुधा की शादी कहीं और हो जाती है और अंत में उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ता है।

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शांति लाउंज: कहानी (सुशील कुमार)

नीचे उतरते ही शोर छँटने लगा — कदमों की आहट, बच्चों की हँसी, दुकानों के कनफोड़ संगीत — सब पीछे छूट गए। बेसमेंट में हल्की ठंडक थी और दीवारों पर नीली धुँधली रोशनी फैल रही थी। बीचों-बीच एक पारदर्शी केबिन था, जिस पर लिखा था — शांति लाउंज – पाँच मिनट का पूर्ण मौन अनुभव; नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था — कृपया अपनी आवाज़ अपने भीतर रखें। शीशे के पार दो-तीन आकृतियाँ धुँधली दिखीं। उसने फोन साइलेंट किया और काउंटर की ओर बढ़ी।  

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खेद

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती हैलिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

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इसरो का पीएसएलवी-सी ५२

जून आज सुबह जल्दी चले गये।शनि व रविवार को उन्हें असोसिएशन के काम में और अधिक समय देना होगा।वह अपने कार्य में बहुत रुचि ले रहे हैं, और उन्हें अपने काम में बहुत आनंद आ रहा है। उसने काव्यालय में एक कविता प्रकाशित की। छोटी ननद ने बताया छोटे पुत्र का कॉलेज दो वर्ष के बाद खुल रहा है। 

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शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों... क्यों शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता

सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

▪️ क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :- सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

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फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव