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शुक्रवार, 12 जून 2026

4771...जल से है पृथ्वी पर जीवन...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य के लिए धरती का अर्थ उसके घर का आँगन, आसमान छत, सूरज-चाँद- सितारे उसके लिए दीपक, सागर-नदी पानी के मटके और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं। मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है।
खुला आसमान और विशाल धरती के बीच इंसान प्रकृति का एक अदना सा हिस्सा है। इंसान कितना भी ज्ञान अर्जित कर ले, कितना भी विज्ञान को जान जाये लेकिन प्रकृति हर बार कुछ ऐसा कर जाती है कि हर बार उसके करिश्मे के आगे विज्ञान भी घुटने टेक देता है।
इस दुनिया की सभी नकारात्मक शक्तियां मनुष्य जनित ही हैं। यदि मनुष्य प्रलोभनों, लोभ व स्वार्थ के अंधेरों में न भटकता तो उसे कृत्रिमता पर आधारित जीवन नहीं अपनाना पड़ता। इसी व्यवहार के कारण मानव और प्रकृति के बीच का तारतम्य टूट गया है। परिणामस्वरूप मानवीय विचार, भावनाएँ तथा ज्ञान पारदर्शी न रहकर द्वंद्वात्मक हो गए। अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाएँ स्वार्थी मानवीय कृत्यों का दंड ही तो है।
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आज की रचनाऍं-



बाँह गहे को अरसा गुजरा
उपजा नहीं भरोसा
सजा-सजाकर उसने खुद को
कितनी बार परोसा
रिश्ते का नासूर आज खुद
उसने फोड़ दिया।



मातु पिता को त्याग बढ़ रहे, अब एकल परिवार।
सुविधाओं के लेनदेन को, समझ रहे हैं प्यार।।
आया पाल रही बच्चों को, स्वयं पालते श्वान।
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!


जल से है पृथ्वी पर जीवन

हरदम इसका ध्यान धरें

डिटर्जेंट डाल डाल सरि को

कभी न लहूलुहान करें।

प्राणवायु देता है पीपल

बरगद से मिलती है छाया 

मेट्रो के खम्भे ने छीना

उनसे उनकी विस्तृत काया




स्त्री अगर अकेली है, कमजोर है तो उसे समाज रोता हुआ, असहाय और दीन हीन ही देखना चाहता है। ऐसी स्त्री जिसे तमाम कंधों की ज़रूरत हो। ताकि तमाम बेरोजगार कंधों को रोजगार मिले। लेकिन जैसे ही स्त्री कमजोर होने के बजाय लड़ना और रोने बिसूरने के बजाय खुश रहना चुनती है वह किरकिरी हो जाती है, जिसे डायन से लेकर न जाने कितने नाम दिये जाते हैं। ज़ाहिर है उसका चरित्रहीन होना तो सबसे पहले है ही।


लेकिन उन परिवारों के लिए जिंदगी कभी सामान्य नहीं होती। एक मजदूर की मौत केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों, बच्चों के भविष्य और घर की रोटी का अंत होती है। सबसे दुखद बात यह है कि इन मौतों को समाज ने लगभग सामान्य मान लिया है। जैसे यह कोई हादसा नहीं, बल्कि उनका तयशुदा भाग्य हो। सुरक्षा उपकरणों के बिना लोगों को जहरीले गटरों में उतार दिया जाता है। कई बार ठेकेदार और अधिकारी जानते हैं कि यह गैरकानूनी है, फिर भी यह सब जारी रहता है। 


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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2 टिप्‍पणियां:

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