---

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

4093...चल-चल के घबराए...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. जेन्नी शबनम जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में प्रस्तुत हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-


पात पात पर पखेरू गात

संग अनंग वसंत मधुरास रत,

आरक्त कानन का आनन है।

उलझी बेल द्रुम प्रेम खेल में,

ऋतु हाला में अवगाहन है।

774. नैनों से नीर बहा (19 माहिया)

3.

दुनिया खेल दिखाती
माया रचकरके
सुख-दुख से बहलाती।

4.
चल-चल के घबराए
धार समय की ये 
किधर बहा ले जाए।

शायरी | मुस्कुराहट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मेरे जाने के बाद

तुम कहते हो बुरे वक्त को निकाल फेंको जीवन से,

अच्छे दिनों की मियाद खुद ब खुद बढ़ जाती है,

जैसे बालों से निकाल दिया जाता है मुरझाया फूल,

पैरों से कांटा,

उधारी की याद,

विरह की रात,

स्वर्ण मीन--

जुगनुओं
का नृत्य चलता है रात भर, अद्भुत एक
आभास जीवित रखती है मुझे उस
गहराई में प्राणवायु विहीन,

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

4 टिप्‍पणियां:

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।