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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

4087....तो क्या बीते ज़माने की बात हुई ब्लॉग लेखन...

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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हर मौसम का अपना बसंत होता है,
गर्मियों के स्वागत में नीम,पीपल,बरगद,गुलमोहर और 
अनगिनत विशाल छायादार वृक्ष नये पत्रों से
सुसज्जित हो गये हैं लू और प्रचंड ताप से पत्तियों के चंवर डुलाकर तन-मन को सुकून देने के लिए,
ठंडे तासीर वाले,रसीले, फल और स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हल्के मसालों में पकायी जाने वाली सब्जियां तैयार हैं।
गर्मी में जब नन्हें तृण भी झुलस जाते हैं बेला,चम्पा,मधुमालती, गंधराज,शिरीष,गुुलमोहर,अमलतास जैसे पुष्पों की शोभा और सुगंध वातावरण में
अनूठी मादकता बिखेर रही है।
हर मौसम की तरह
प्रकृति ने तो गर्मियों से जूझने के लिए स्वंय को तैयार कर लिया है और हम मनुष्यों ने क्या किया है?
वातावरण को असंतुलित करने में कोई कसर छोड़ी है?
क्या प्रकृति प्रदत्त उपहारों का उपभोग करना ही हमारा कर्तव्य है क्या प्रकृति के प्रति सचमुच हमारा कोई दायित्व नहीं?
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आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-


ये सवाल तो मेरे मन में भी है...

तो क्या बीते ज़माने की बात हुई ब्लॉग लेखन



क्या कोई भी सच में ही ब्लॉग लेखन नहीं कर रहा , पहली नज़र में देखें तो लगता तो ऐसा ही है , लेकिन जब मैं ब्लॉगर के अपनी पसंद के ब्लॉग पठन की सूची देखता हूँ तो पाता हूँ कि कोई तो है , बल्कि कई लोग हैं जो आज भी अब भी कभी नियमित अनियमित होकर या गाहे बेगाहे ही लिखते जरूर हैं।  



खिड़की खुली रखना


खुली होगी खिङकी
तो दीखेगा आसमान 
कभी-कभी चाँद 
और शीतल चाँदनी ।
तारों भरी ओढ़नी 
किसी छज्जे पे अटकी,
कहीं दूर से आती
किसी की मीठी
आवाज़ में रागिनी ।



दिल से दिल तक



मेरे लिए तो इतना ही 
काफी है कि 
तुम्हारे दिल तक मेरी 
बात पहुँची
अच्छा लगा सुन कर
बाकी अपना क्या है?
अपने दिल में तो वैसे ही 
तुम्हारी स्मृतियाँ 
ब्लड ऑक्सीजन सी

बहती रहती हैं




ग़ज़ल



बांध कर रखो जुल्फों को।
बाद-ए-शोख उड़ा न दे।।
चांद फिरे है इतराता।
रूख तिरा कोई दिखा न दे।


सॉनेट/अनिमा दास

न होती यक्ष-पृच्छा..न मिथ्या विवाद की धूमित ध्वनि 
न कोई करता अनुसरण सदा अस्तमित सूर्य का कभी 
न पूर्व न पश्चिम न उदीची से.. प्रत्ययी पवन की अवनि  
न होती नैराश्य-बद्ध..निगीर्ण ग्लानि में रहते यूँ..सभी।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में ।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति
    स्तरीय रचनाओं के साथ
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. फूलों सी महकती चिन्तनपरक भूमिका के साथ पुष्पगुच्छ सी सुन्दर प्रस्तुति में सृजन को सम्मिलित करने के लिए हृदयतल से आभार श्वेता जी ! सस्नेह नमस्कार !

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर संकलन , पोस्ट को स्थान देने के लिए शुक्रिया और आभार , अन्य पोस्टों को भी जरूर बांचते हैं अभी

    जवाब देंहटाएं
  4. जितनी गर्मी उतने ही सुन्दर खिलते हैं फूल ! आपने सजीव चित्र उकेरा है, श्वेता जी. कविता, लेख, ग़ज़ल, सॉनेट में चिंतन खिला , यह संकलन सार्थक हुआ.

    झा साहब ने ब्लॉग लेखन पर चिंता जताई, जो हम सबकी है. हमें भी दो बातें कहनी हैं.

    शायद ब्लॉग नहीं, किसी और नाम से format उपलब्ध हो जाए. धीरे-धीरे ब्लॉग पत्रिकाएं भी लुप्त होने की कगार पर हैं. पर यह भी सच है कि हम जैसे लिखने वाले भी बहुत होंगे जिनकी किताबें नहीं छपतीं, प्रिंट में जगह नहीं मिलती, अपना लिखा साझा करने ले लिए और कौनसा मंच है ? साझा संकलन में पैसे देकर छपना ? क्या उसका कोई मूल्य है ? और कौन पढ़ता है ? हम लिखते हैं ब्लॉग पर अपना सुरक्षित कोना जान कर ,जिस पर कभी-कभार गुणी जनों की नज़र पड़ जाए, वरना अपनी डायरी ही समझ लेते हैं .

    दूसरी बात है, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से ऊब कर , उसके हानिकारक परिणाम जान कर कई लोग कागज़ - कलम फिर से उठा रहे हैं. विद्यार्थियों से लेकर कामकाजी लोग तक. पहिया घूम रहा है.

    बहरहाल, आप सबसे निवेदन है कि ब्लॉग के कौनसे विकल्प अपना रहे हैं लोग,जानकारी के लिए बताइयेगा. यह विषय उठाने के लिए धन्यवाद.

    नमस्ते.

    जवाब देंहटाएं

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