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बुधवार, 3 जनवरी 2024

3994..सितारों की दशा और दिशा

।।भोर वंदन।।

ठिठुरी रातें, पतला कम्बल, दीवारों की सीलन..उफ़

और दिसम्बर ज़ालिम उस पर फुफकारे है सन-सन..उफ़

इक तो वैसे ही रग-रग में जमी हुई है मानो बर्फ़

ऊपर से कमबख्त़ सितमगर शबनम का भी जोबन..उफ़

बूढ़े सूरज की बरछी में ज़ंग लगा है अरसे से 

कुहरे की मुस्तैद जवानी जैसे सैनिक रोमन..उफ़

गौतम राजॠषि 

धूप के सुनहरे गर्माहट संग आज की प्रस्तुतियाँ का आंनद लें...✍️


🔶️


समय के साथ उसके पैर नहीं यह वाक्य लड़खड़ाने लगा
तभी से मैं 
पुरुष शब्द का एक और अर्थ स्त्री पढ़ने लगी..
🔶️


जब रातों में चुपके से सिरहाने आकर

महबूब ना फेरे बालों में उगलियां

जब प्रियतम ना पढ सकें वो आंखें,

जिनमें बसा हुआ है वह ..

🔶️

1 जनवरी को क्या नया हो रहा है ?


न ऋतु बदली.. न मौसम

न कक्षा बदली... न सत्र

न फसल बदली...न खेती

न पेड़ पौधों की रंगत

न सूर्य चाँद सितारों की दिशा

ना ही नक्षत्र..

🔶️


नयी तिथियों की उँगली थामे
समय की अज्ञात यात्रा पर चलना चाहती हूँ।
इस बरस का हर दिन

खुशियों की पोटली से बदलना चाहती हूँ।

।। इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️


2 टिप्‍पणियां:

  1. नव वर्ष शुभ हो
    बेहतरीन अंक
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. मार्मिक भूमिका के साथ अति सराहनीय रचनाओं का संकलन है दी।
    मेरी रचना शामिल करने के लिए अत्यंत आभारी हूँ।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं

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