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मंगलवार, 27 जून 2023

3801...सुहागरात का पूर्वाभ्यास

 सादर आभिवादन

आल इज़ वेल..
बस कुछ ही दिन बाकी है
फिर एव्हरी थिंग इज़ वेल होगा
रचनाएं देखें ....
मानव सदा एकरस,
शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य आत्मा है।
वह पूर्ण है, प्रेमस्वरूप है,
आनंद उसका स्वभाव है।
प्रेम तथा आनंद को व्य
क्त करना दैवीय गुण हैं।
आत्मा में रहना
सदा स्वीकार भाव में होने का नाम है



किसी ने नजरअंदाज किया
मेरा भ्रम तोड़ दिया
मुझे एक झटका लगा मलने
यह गलतफहमी पाली
मैं पूरी सक्षम हूँ



आंख में लज्जा पानी
बिंदिया लगती सुहानी
स्वर जब कोमल मधुर हो
स्वर्ग यह संसार हैं


लटक रहा रेशम डोरी पे,

झूला था मन के आँगन में।

झूल रहा था रोम-रोम मेरा,

वो बाँधे निज आलिंगन में।

मैं झूली कुछ ऐसे झूली

भूल गई अपनी काया भी,

खुलती जाती डोर स्वयं से

बिखरा जाता बूटा-बूटा॥



सारे कलाकार आपसी संवाद में
माह-दो माह भर के पूर्वाभ्यास से
और फलतः कर पाते हैं प्रायः एक दिन
एक कालजयी सफल मंचन ..बस यूँ ही...

चार दिन सीखे नहीं के सबको सिखलाने लगे
चंद ऐसे लोग ही हर सिम्त मंडराने लगे

आज बस
सादर


3 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभात!
    आज के सभी लिंकों पर जाना हुआ, विभिन्न विषय और शैली की प्रस्तुति ।
    शानदार अंक । बधाई और शुभकामनाएं!

    जवाब देंहटाएं
  2. सदैव सब कुशल मंगल रहे

    सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात! सारगर्भित रचनाओं का सुंदर संकलन, 'डायरी के पन्नों से; को शामिल करने हेतु बहुत बहुत आभार यशोदा जी!

    जवाब देंहटाएं

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