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गुरुवार, 16 सितंबर 2021

3153...दिन गुज़र जाता है खुद से बात कर.

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक की रचनाएँ प्रस्तुत हैं-

 हो तुम मेरे ही कान्हां


अलग ही है पहचान तुम्हारी

बाल सुलभ चंचलता नयनों में

यही अदा प्यारी है मुझको

मैं हो जाऊं  तुम पर न्योछावर।

 

वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र


सुन चहल-कदमी गुज़रती उम्र की,

वक़्त की कुछ मान कर अब तो सुधर.

रात के लम्हे गुज़रते ही नहीं,

दिन गुज़र जाता है खुद से बात कर.

 

उतराई के चेहरे - -

ज़िन्दगी खोजती

है दूर सरकती

हुई सांसों

की

गुंजन

शाम ढले तलहटी पर थे सभी

चेहरे गहराई तक बोझिल

 

खेल खेल में - एक लघुकथा

पागल हो गया है क्या दीनू! तिरंगा ज़मीन पर फेंकेगा।” और झंडा हाथ में ऊँचा उठा वन्दे मातरम्’ का जयकारा लगाते हुए उसने दौड़ लगा दी! फ़ौजी और आतंकी सारे बच्चे उसके पीछे पीछे ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’ नारा लगाते हुए दौड़ पड़े!


शहर का नाम देहरादून कैसे पड़ा


 
गुरु राम राय जी ने कहा कि आप ग्रन्थ साहिब को दुबारा देखेंदुबारा देखने पर मुसलमान शब्द की जगह बेईमान शब्द पाया गया जो कि एक चमत्कार थाऔरंगजेब की तसल्ली हुई और उसने गुरु राम राय जी को 'हिन्दू फ़क़ीरऔर 'कामिल फ़क़ीरका दर्जा दे दियापर बाबा राम राय जी के इस चमत्कार से उनके पिता गुरु हर राय जी सख्त नाराज़ हुएगुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी के कारण नाराज़ पिता ने पुत्र को गद्दी से वंचित कर दिया और कह दिया कि तुम्हारा यहां रहना संभव नहीं है.

 *****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

6 टिप्‍पणियां:

  1. 'देहरादून' को शामिल करने के लिए धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. संक्षिप्त, सुन्दर, सार्थक सूत्रों से सुसज्जित बढ़िया हलचल आज की ! मेरी लघुकथा को स्थान दिया आपका ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार रवीन्द्र जी ! सादर वन्दे !

    जवाब देंहटाएं

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