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गुरुवार, 9 सितंबर 2021

3146...'भ्रमण करे जब निशा सुंदरी तारक दल जैसे पहरी है'...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से। 

 सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ। 

 एक देश की राजनीतिक सामाजिक उथल-पुथल दुनिया के कई देशों की नीतियों एवं कार्यक्रमों को प्रभावित करती है। 

आइए पढ़ते हैं चंद चुनिंदा रचनाएँ- 

सफलता

उसी के कदम चूमें सफलता ने 

जिसने असफल से भय पाला 

बार बार गिर गिर कर सम्हला 

यही सही किया उसने। 


श्याम मोहिनी

रजनी कर श्रृंगार निकलती

रुनझुन पायल झनकाती

श्याम मोहिनी वो सुकुमारी

नीले कंगन खनकाती

भ्रमण करे जब निशा सुंदरी

तारक दल जैसे पहरी है।।


 मेरी कविताएँ

जब-जब तुम छूट गईं अकेले 

हमने पकड़ी उँगली ,इक आस जगाई 

हम रहीं तुम्हारे साथ चन्दा ,सूरज ,तारे महकाने 

तुम अपनी कल्पना शक्ति के रँग भरतीं 


प्रेम में जोगिया

जोगिया मुझसे मिलना

जब मिले देह काशी

घाट मणिकर्णिका

क्लांत पथ कोस चौरासी


हम मां का कहना माने तो...

मां होती है नाराज नहीं,तीखी उसकी आवाज नहीं।

मातृत्व का कोई ताज नहीं, मां की लोरी में साज नहीं।

मां के चरणों की धूली से,मस्तक का चंदन बन जाए।

हम मां का कहना....

नीति के दोहे मुक्तक

काला  होय धंधा धन, दोनों रहते गोय। 

जीवन सदा सुखी रहे, सत्ता कंधा होय।।

*****


आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति
    जीवन सदा सुखी रहे, सत्ता कंधा होय
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    शानदार प्रस्तुति आज के अंक की |मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार सहित धन्यवाद रवीन्द्र जी |

    जवाब देंहटाएं
  3. आज के पाँच लिंक्स में मेरी रचना को शामिल करने के लिए बहुत- बहुत धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर सारगर्भित रचनाओं का संकलन ।

    जवाब देंहटाएं

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