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शनिवार, 3 अप्रैल 2021

2087... मन्नू भंडारी और निर्मल वर्मा

हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

हिन्दी साहित्य समुन्द्र के दो मोती हिन्दी साहित्य नभ के दो सितारे

मन्नू भंडारी (90 वाँ जन्मोत्सव )
पुराणों और इतिहासों में भी कहानियाँ दिखाई पड़ती हैं जैसे – ईसॉप कथाएं, पंचतंत्र कथाएँ, जातक कथाएँ आदि जो आज के समय में भी बहुत मशहूर हैं। यहाँ हम कह सकते है – ‘old is gold अथार्त सोने की चमक कभी भी काम नहीं होती। यह निर्विवाद सत्य है कि मानव के मन को प्रभावित करने के लिए कहानी में अद्भूत क्षमता होती है। पहले कहानी का उद्देश्य उपदेश देना और मनोरंजन करना माना जाता था लेकिन आज कहानियों का मुख्य उद्देश्य मानव जीवन की विविध प्रकार की समस्याओं और संवेदनाओं को आम जनता तक पहुंचाना है। यही कारण है कि प्राचीन कहानियों से आधुनिक हिन्दी कहानियाँ बिल्कुल ही अलग है।

मन्नू भंडारी

कलात्मकता उनके समूचे व्यक्तित्व से लेकर उनके लेखन तक में व्याप्त है। अजमेर के ठेठ मारवाड़ी और संबंधों में निष्ठा रखने वाले संयुक्त एकजुट परिवार जहां लड़कियों का नौकरी करना तौहीन समझी जाती थी, वहां मन्नूजी ने स्कूल में नौकरी कर पहली सीमा लांघी।

मन्नू भंडारी

मन्नू जी की यह आत्मकथा पढ़ते हुए मैंने जाना कि एक मीठे पानी की नदी सा मालूम पड़ने वाला उनका जीवन दरअसल तटबंध किये हुए खारे सागर के जैसा था मगर मन्नू के भीतर अथाह क्षमता थी,डूब कर मोती खोज लाने की | एक बेहद ईमानदार व्यक्तित्व और उतनी ही सच्ची,बेबाक और स्पष्ट लेखन शैली वाली लेखिका,जिनके करीब जाने पर आप एक बेहद आम सी औरत को पायेंगे जो स्वंय को हीनता ग्रंथि से ग्रस्त मानती हैं पर उनके भीतर झांकते ही या उनकी रचनाएं पढ़ते ही एहसास होता है कि कितनी विनम्र , निर्मल हृदया और गंभीर लेखिका हैं

निर्मल वर्मा (92 वाँ जन्मोत्सव)

अँधेरा होते ही हवा रुक गई। कुछ भी नहीं हिल रहा था; न झाड़ी, न पत्ता, न पेड़। कभी-कभी जंगल के भीतर से एक गर्म उसाँस-सी निकलती थी, सिर-सिर करती एक सीटी बजाती थी - ऊपर उठ जाती थी - धोबीघाट के ऊपर... कुत्तों को चौंकाती हुई आगे बढ़ जाती थी, गंदे नाले पर उतर जाती थी और धीरे-धीरे सरकती हुई निहालचंद्र के घर के फाटक पर आ कर रुक जाती थी।

निर्मल वर्मा

नाटक की तैयारी में एक निश्चित व्याकरण काम करता है, उसमें सामान्यतः एक चरित्र का निर्माण किया जाता है और शुरू से अंत तक उसको बनाये रखा जाता है। वहीं कहानी की प्रस्तुति में उसे तोड़ना पड़ता है बल्कि यूं कहें कि उसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। जैसा कि ‘यह घर मेरा नहीं’ से स्पष्ट हुआ, कि कभी पल भर में अभिनेता उसके पाठक हो जाते हैं तो कभी व्याख्याता और कभी उस दृश्य में हिस्सा लेने वाले चरित्र। कहानी को प्रस्तुत करते समय अभिनेता के सामने इस तरह की सदैव नई चुनौतियां आती हैं और हर बार वह किसी नए रास्ते को ढूंढ़ निकालता है। अभिनेता की इन्हीं संभावनाओं और चुनौतियों को लक्ष्य कर के ही अंकुर जी इसे ‘अभिनेता का रंगमंच’ कहते हैं। जो अभिनेता स्वयं लेखक है, पाठक है, व्याख्याकार है, टिप्पणीकार और अंततः एक चरित्र भी है।

क्या हम इतिहास से त्रस्त, आधुनिक शहरों में रहनेवाले प्राणी— ऐसे क्षण को जी सकते हैं, ऐसे अनुभव को भोग सकते हैं? या उसे हमने हमेशा के लिए खो दिया है? खंडहरों के बीच घूमते हुए मुझे कभी-कभी लगता है कि वैसा अनुभव आज भी असम्भव नहीं है। हमारे बीच दो चीजें ऐसी हैं जिनके सामने, जिन्हें छूकर हम अपने साधारण क्षणों में भी इतिहास की चिरन्तनता और प्रकृति- जो शाश्वत है—उसकी ऐतिहासिकता—दोनों को एक समय में अनुभव कर सकते हैं। अजीब बात यह है, ये दोनों चीजें अपने स्वभाव में एक-दूसरे से बिल्कुल उल्टी हैं— एक ठोस और स्थायी, दूसरी सतत प्रवाहमान, हमेशा बहने वाली— पत्थर और पानी।

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पुन: भेंट होगी...

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10 टिप्‍पणियां:

  1. दो मूर्धन्य साहित्यकारों का परिचय
    उनकी रचनाओं के माध्यम से, हमारा यह ब्लॉग
    आपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा है..
    महामना भंडारी जी के कुछ उपन्यास मैं पढ़ी हूँ, पढ़ी हूँ न कहकर यह कहती हूँ कि पढ़नी पड़ी,कालेज मे हिन्दी साहितय का विषय जो ले रक्खी थी, श्री भंडारी जी के अलावा श्री इलाचन्द्र जोशी,वात्स्यायन जी के उपन्यास व अन्य कृतियां भी पढ़ी,...
    आभारी हूँ दीदी,
    बढ़िया अंक..
    सादर नमन..

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया ! सराहनीय प्रयास !!

    जवाब देंहटाएं
  3. दो दिग्गज साहित्यकार और उनकी रचनाओं तक पहुंचाने के लिए आभार विभा जी ।

    जवाब देंहटाएं
  4. मैं अपने ब्लाॅग पर और पेज कैसे बनाऊ कृपया सुझाव दे

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. श्वेता से बात करिए
      ब्लॉग सम्पर्क फार्म के माध्यम से
      सादर

      हटाएं
  5. बेहद सराहनीय अंक दी।
    उत्कृष्ट प्रस्तुति।
    आभारी हूँ दी।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुंदर प्रस्तुति आदरणीय दीदी!
    निर्मल वर्मा के बारे में ज्यादा नहीँ जानती पर मन्नू जी को अच्छा खासा पढ़ा मैंने। उनका जीवन दर्शन सोचने पर मजबूर कर गया
    जब किसी के साथ रहते हुए भी अकेले ही जीना हो, तो उस साथ के होने का भरम टूट जाना ही अ%छा होता है।
    सभी लिंक पठनीय रहे
    हार्दिक शुभकामनाएं और आभार 🙏🙏💐💐

    जवाब देंहटाएं

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