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शुक्रवार, 22 मई 2020

1771 ..जिंदगी से युद्ध कर रहा हूँ...

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल
अभिवादन।
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असली प्रश्न यह नहीं कि मृत्यु के बाद
जीवन का अस्तित्व है कि नहीं,
असली प्रश्न तो यह कि 
क्या मृत्यु के पहले तुम
जीवित हो?
उपरोक्त कथन 
 किसी भी महान उपदेशक,विचार या चिंंतक का हो,
किंतु इन पंक्तियों में निहित संदेश
की सकारात्मकता आत्मसात करने योग्य है।

★★★★★
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-

नवीन ब्लॉग परिचय
अदृश्य शक्तियां ...विद्या महेन्द्रसिंह "हंस"
अदृश्य शक्तियों से लड़ना,
और डरकर भाग जाना,
किसी ईश्वर, अल्लाह, मसीह को रक्षक मान कर
वह आपकी रक्षा, मनोबल,उन्नति, सफलता का
ठेकेदार बनेगा,
प्रथम दृष्टया हार मान लेना जैसे होगा,



वह अनंत पथ ख़ुद से जाता


प्रतिपल नीलगगन से आतीं 
लहरें सिंचित करतीं मन को, 
नीचे धरती माँ सी थामे 
दृष्टि टिकी हो मात्र लक्ष्य पर !


किंतु सोचो तुम भला अब क्या करोगे?
बच गए जो भाग्य से, क्या फिर बहोगे?

बहना पड़े फिर धार में, इतना करो तुम
भूलकर यूँ, पतवार भी मत फेंकना तुम


काली रातों की भस्म मल रहा हूँ उम्मीद के सर्द मौसम से डर रहा हूँ चिलचिलाती धूप में भी नंगे पाँव चल रहा हूँ हर गली कूचे शहर में सिर्फ मैं ही मर रहा हूँ

चंचल तितलियों की, फिर धमाचौकड़ी होंगी
रात के संजोये, हसीन सपने सभी पूर्ण होंगे
धरा पर फिर नव बिहान, नव रस गान होंगे
हरिताभ खेत,बन,उपवन ,लहलहा के झूमेंगे ।

साधारण चेहरे के पीछे एक असाधारण सोच
साधारण और असाधारण व्यक्तित्व में बस यही अन्तर होता है कि वह नेतृत्व के योग्य ठहराया जाता है और फिर उसके व्यक्तित्व की परते उघड़ने लगती है जब लगता है कि कुछ तो है! किसी भी क्षेत्र का भीड़ से अलग व्यक्ति हमेशा जानने योग्य रहता है। लोग उसकी जड़े तक खोद डालते हैं और फिर कलाम जैसे व्यक्ति असाधारण बन जाते हैं। सोचिये यदि कलाम राष्ट्रपति नहीं बनते तो क्या वे इतने असाधारण होते? वे अपने क्षेत्र में असाधारण होते लेकिन आमजन उनके जीवन में रुचि नहीं लेते।
....
इस अंक हेतु सलाह व सुझाव की अपेक्षा में


हम-क़दम का नया विषय


यहाँ देखिए
कल का अंंक पढ़ना न

भूले,
विभा दीदी आ रही हैं
अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।
-श्वेता

11 टिप्‍पणियां:

  1. स्वयंसिद्ध बेहतरीन
    शुभकामनाएँ नए ब्लॉग को
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!बेहतरीन प्रस्तुति श्वेता ।

    जवाब देंहटाएं
  3. जीवन में जिंदा होना थोड़ा मुश्किल है
    हर रोज खुद के ज़मीर का कातिल है

    सराहनीय प्रस्तुतीकरण

    सदा स्वस्थ्य रहें..

    जवाब देंहटाएं
  4. मृत्यु के पहले हम जीवित हों भी पर पूरी तरह जगे तो नहीं हैं, आज देश दुनिया में जो हो रहा है उसको देखकर तो नहीं लगता मानव सजगतापूर्वक जी रहा है. सुंदर प्रस्तुति, आभार मुझे भी आज की हलचल में शामिल करने हेतु !

    जवाब देंहटाएं
  5. नायाब कलेक्शन श्वेता जी

    जवाब देंहटाएं
  6. लाज़बाब प्रस्तुति श्वेता जी,हमारी रचना को शमिल करने की लिए हार्दिक धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  8. असली प्रश्न यह नहीं कि मृत्यु के बाद
    जीवन का अस्तित्व है कि नहीं,
    असली प्रश्न तो यह कि
    क्या मृत्यु के पहले तुम
    जीवित हो?

    यक्ष प्रश्न जिनके उत्तर हमारी आत्मा ही दे सकती है बशर्ते वह जीवित हो
    हम तो खुद से झूठ बोल बोलकर पूरा जीवन गुजार देते हैं ।
    --सुंदर प्रस्तावना के साथ उम्दा लिंक्स👌👌👌

    जवाब देंहटाएं

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