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मंगलवार, 19 मई 2020

1768...प्रेम के बीज हैं...

मंगलवारीय अंक  में
 आप सभी का स्वागत है।
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कहीं पढ़ा था कि गुरू रवीन्द्रनाथ शरीर से पुरुष थे, लेकिन चित्त उनका स्त्रियों का सा था। वे रबीन्द्रबाई भी कहे जा सकते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे जैन तीर्थंकर मल्लीबाई शरीर से स्त्री थीं, लेकिन उनकी साधना पुरुषों की सी थी, इसलिए वे मल्लीनाथ कहाईं।

पुरुषों को कवि होने के लिए स्त्रियों का सा हृदय चाहिए। वहाँ करुणा है, स्वप्न है, कल्पना है, राग है, मोह-ममता भी है। इसलिए वहाँ काव्य है। दोनों में कोई बड़ा-छोटा नहीं है। दोनों एक ही आत्मस्वरूप हैं। लेकिन प्रकट अवस्था में कविता स्त्री ही है।
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आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैंं-
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परदेशी थे ,  परदेशी  ही रहे 
अपना पाया  ना शहर तुम्हें  , 
गले लगाने  कोई मसीहा - 
ना आया किसी भी  पहर तुम्हें ;
 भूले   निष्ठा  अगाध तुम्हारी 
 उठेगी  ना ये नज़र    झुकी !



मैंने डाले नहींतुमने सींचे नहीं
प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं  

उठती हैं, मिटती हैं, फिर उठती हैं
लहरों की चाहत है पाना


सन्नाटा गहरा पसरा गया, गली मोहल्ले शहरों में
फिर भी डर लूटों के देखे, हमने लोगों की बातों में

भटक रहा कोई दर दर, सिसक रहा कोई सड़कों में
फिर भी चर्चे खोखले देखे, हमने लोगों की बातों में


कल कल करती जल की धारा

रुक कर ये एक बात बताती है।

निर्मल मन रख कंर करना जब,

अर्पण हो या तर्पंण शांति लाती है।


वन,पर्वत सरिता,गगन पवन से सामंजस्य बना संतत .
ऋतुओँ से कालविभागों के अनुकूल सदा  नियमित संयत   ,
जड़-चेतनमय जग जीवन को करता चलता सादर स्वीकृत.
तब विधना धरती के मानव से बोल उठे यों स्नेह  सहित 

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अब बारी है हमक़दम के विषय की
इस बार का विषय है-
चित्राधारित लेखन


इस चित्र को देखकर जो भाव और विचार उमड़ते हैं
उसे शब्दों में पिरोना है।
रचना भेजने की
अंतिम तिथि:23 मई 2020
प्रकाशन तिथि:25 मई 2020

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आज बस इतना ही।
कल आ रही हैं पम्मी दी अपनी
विशेष प्रस्तुति के साथ।

#श्वेता







14 टिप्‍पणियां:

  1. स्वागत सखी...
    वजनदार प्रस्तुति..
    विस्मयकारी विषय..
    आभार....

    जवाब देंहटाएं
  2. सृष्टि के संचालन के लिए अर्द्धनारीश्वर बने थे.. स्त्री में कुछ पुरुष के गुण और पुरुष में कुछ स्त्रियों के गुण होने से पूर्णता प्राप्त इंसान होना सम्भव होता है.. सुंदर भूमिका के संग सराहनीय प्रस्तुतीकरण

    जवाब देंहटाएं
  3. वही गुण स्त्री में ओर वही पुरुष में -अंतर केवल यह कि एक में कुछ विशेष गुणों की प्रधानता और दूसरे में दूसरे गुणों की.विशेष परिस्थितियों में मनस्थिति बदलने पर तदनुरूप गुण का प्रबल हो उठना सहज मानवीय स्वभाव है.

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह!खूबसूरत भूमिका श्वेता 👌सुंदर लिंक संयोजन ..।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत खूब श्वेता जी ,कविता और कवि हृदय का सार समझाती सुंदर भूमिका के साथ बेहतरीन लिंकों का चयन ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  6. बातें तो सार्थक कहिन,
    जुडे धड और शूल,
    आगे समझ अपुन की,
    टहनी सींचे या मूल,

    जवाब देंहटाएं
  7. स्त्री सर्वगुन सम्पन्न है जबकि पुरुष अधूरा है स्त्री बिना ...
    अच्छे सूत्र संजोए हैं आज ...
    आभार मेरी रचना को जगह देने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं
  8. सार्थक प्रस्तुति प्रिय श्वेता | यद्यपि दया , करुना इत्यादि को किसी व्यक्ति विशेष से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है , पर ये शश्वत सत्य है कि
    हर नारी में ये गुण बहुधा विराजमान रहते हैं | गुरुवार और जैन तीर्थकर के बारे में नयी बातें जानी | इस सुंदर चर्चा में मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार | आज के सभी रचनाकारों को शुभकामनाएं| सस्नेह --

    जवाब देंहटाएं
  9. उर्वर भूमि में ही बीज उगते, पल्लवित एवं पुष्पित होते हैं। सत्य ही है सृजन के लिए स्त्रियों का सा हृदय चाहिए। सादर

    जवाब देंहटाएं
  10. सार्थक भूमिका के साथ शानदार प्रस्तुति उम्दा एवं उत्कृष्ट रचनाएं...
    सभी रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं

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