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सोमवार, 4 मई 2020

1753 हम-क़दम का एक सौ अट्ठारहवा अंक....शोहरत

सादर अभिवादन
शोहरत
काफी कोशिश की पर लिख नहीं पाए कुछ ऐसा समझे कि 
शोहरत में नशा कैसे होता है, क्यों होता है
शोहरत और घमंड सफलता के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं  ...
मेहनत और संघर्ष के बाद मिली कामयाबी और शोहरत वाकई लाजवाब होती है. एकदम जबरदस्त होता है शोहरत का नशा , कईयों को तो इतना होता है जैसे की कोकीन सूंघ ली हो , 

व्यक्ति अपने नाम और शोहरत के लिए जितना गंभीर रहता है उतना ही वह बदनाम को लेकर सचेत रहता है. क्योंकि कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता है कि जीवन में उसे बदनामी का सामना करना पड़े. 

कुछ कालजयी
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कालजयी

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे


सिफारिश से शोहरत नहीं चाहिए
अब किसी की इनायत नहीं चाहिए

बागबां से परिंदों ने कह ही दिया
अब चमन में शरारत नहीं चाहिए

दोस्ती से यकीं उठ गया इस कदर
दोस्तों की हिफाज़त नहीं चाहिए


हम उसूलों पर चले दुनिया में शोहरत हो गई ।
लेकिन अपने घर के लोगों में बग़ावत हो गई ।

आँधियों में तेरी लौ से जल गई उँगली मगर,
ये तसल्ली है मुझे तेरी हिफ़ाज़त हो गई ।


ये चाँदनी भी जिन को छूते हुए डरती है
दुनिया उन्हीं फूलों को पैरों से मसलती है

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है



नियमित रचनाएँ
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आदरणीय साधना वैद
जब नयी नयी शोहरत मिलती है,
प्रशंसकों की भीड़ घेरती है ,
लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए
धक्कामुक्की करते हैं ,
दूर से देख कर ही लोग
खुशी के मारे पागल से हो जाते हैं


आदरणीय कुसुम कोठारी
सोने दो चैन से मुझे 
न ख्वाबों में ख़लल डालो।
न जगाओ मुझे यूं 
न वादों में  ख़लल डालो ।

जानने वाले जानते हो 
कितना अर्ज़मन्द उसको ।
पर्दा-ए-राज़ रहने दो 
यूं न शोहरत में ख़लल डालो।।


आदरणीय आशा सक्सेना
फैली खुशबू हिना सी चंहुओर
होने लगी शोहरत दिग्दिगंत में
जिधर देखा उधर एक ही चर्चा  थी शोहरत की उसकी
जागी उत्सुकता जानने की
कैसे पहुंची वह शोहरत के उस मुकाम तक
जानने को हुई आतुर जानना चाहा  सत्य
पहले तो  सही बात बताने को हुई  नहीं राजी


आदरणीय अनीता सैनी
शोहरत रत्नजड़ित मुखौटा

आसान होगा सफ़र सांसों का जहां में,  
शोहरत का रत्नजड़ित मुखौटा पहनने से, 
प्रवचन में गूँथी वाकचातुर्यता यथार्थ को झुठलाती, 
नहीं देख सकती कर्म की अवेहलना को। 



कामिनी सिन्हा जी
शोहरत

हमें तो सिर्फ व्यक्ति विशेष की प्रसिद्धि दिखाई देती हैं 
उसके सफर की कठिनाईयां  नहीं। शोहरत और प्रसिद्धि 
पाने वाले कई महान व्यक्ति की जीवन गाथा जानने के 
बाद उनके हौसले के प्रति नतमस्तक होना पड़ता हैं।

आदरणीय उर्मिला सिंह जी
शोहरत की मदिरा पर 
मत कर इतना गुमान रे इंसान
मत कर इतना अभिमान !

 है ये चार दिनों का खेला 
आज है कल मिट जाए रें इंसांन
मत कर इतना अभिमान !

आदरणीय ऋतु आसूजा
शोहरत का नशा 


शोहरत का नशा जब चढ़ता है, तब मनुष्य ऊपर बस ऊपर की और देखता है उसे यह भी ज्ञात नहीं होता की एक ना एक दिन यह नशा जब उतरेगा तब वह चित होकर धरती पर गिरेगा

और चलते-चलते

आदरणीय सुबोध सिन्हा जी
शोहरत की चाह में


देख जिसे पनपती संवेदना, तभी संग जागते साहित्यकार
भोजनोपरांत फिर उन समाचार वाली लाशों से भी भारी-भरकम
सहेजना कई शब्दों का चंद लम्हों में मन ही मन अम्बार
कर के कुछ सोच-विचार, गढ़ना छंदों का सुविधानुसार श्रृंगार
मिला कर जिसमें अपनी तथाकथित संवेदना की लार
साहित्यकार करते हैं फिर शोहरत की चाह में एक कॉकटेल तैयार

आज बस इतना ही
कल भाई रवीन्द्र जी आ रहे हैं
नए विषय के साथ
सादर





15 टिप्‍पणियां:

  1. शोहरत पर विचारणीय भूमिका के साथ सुंदर प्रस्तुतीकरण. हम-क़दम का सुंदर अंक जिसमें शोहरत विषय पर एक साथ रचनाकारों के कई नज़रिया पड़ने को मिले. सभी को बधाई.
    मेरी रचना हम-क़दम में सम्मिलित करने के लिए सादर आभार आदरणीया यशोदा दीदी.

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  2. नशा किसी चीज का हो नाश करने के लिए काफी है

    सराहनीय प्रस्तुतीकरण
    सदा स्वस्थ्य रहो छूटकी

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  3. वाह!!बहुत खूबसूरत भूमिका के साथ सजा सुंदर अंक ।

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  4. 'शोहरत' पर सभी रचनाएँ अति सुन्दर तथा मनन योग्य है।
    यशोदा जी को हार्दिक धन्यवाद सुन्दर प्रस्तुति के लिए तथा हमारी रचना को शामिल करने के लिए।

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  5. हमकदम का बेहतरीन अंक ,मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय धन्यवाद दी ,सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं सादर नमस्कार

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  6. बहुत अच्छी एकल विशेषांक प्रस्तुति

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  7. सभी की चाहत - "शोहरत" जैसे शब्द से सजे आज के हमक़दम के अंक में कई कालजयी रचनाओँ के साथ-साथ कई सार्थक रचनाओं के बीच हमारी रचना/विचार का साझा होना .. एक सुखद अनुभूति।
    चलते-चलते एक मन की बात ...
    हम मानव .. सिगरेट की उस डिब्बी की तरह हैं जिसके ऊपर "संवैधानिक चेतावनी - धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।" छपी होती है, परन्तु डिब्बी के अन्दर उसी हानिकारक सिगरेट का ज़खीरा भरा होता है।
    मतलब हम स्वयं तो अपनी जाति-धर्म ( हिन्दू/मुस्लिम, कायस्थ-ब्राह्मण/ सिया-सुन्नी ), उपजाति तक ( श्रीवास्तव, अम्बष्ठ ... ) , ओहदे, औक़ात, हासिल किए गए प्रमाणपत्रों को लेकर बारहा गर्दन अकड़ाते हैं, उसके मद में चूर रहते हैं, शोहरत की लालसा में बाबला/बाबली हो कर मेढक/मेढकी बने फ़िरते हैं ; पर दूसरों से धर्मनिरपेक्षता और निष्पक्षता की आशा करते हैं।
    ठीक सिगरेट की उस डिब्बी की तरह - एक दोहरी ज़िन्दगी।
    अगर सिगरेट की डब्बी में सिगरेट हो ही नहीं तो संवैधानिक चेतावनी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी ना ... शायद ...

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  8. सुन्दर सार्थक सूत्रों से सुसज्जित आज की हलचल ! आज के अंक में मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी ! सप्रेम वन्दे !

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  9. शोहरत'विशेषांक में बहुत ही सुंदर प्रस्तुति

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  10. शौहरत से सजी शानदार प्रस्तुति...
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  11. प्रस्तुति'चातुर्यता' का साधुवाद!

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  12. बहुत सुंदर उम्दा ग़ज़लों के साथ सुंदर भूमिका ।
    शानदार शोहरत अंक सभी रचनाकारों को बधाई।
    सुंदर लिंक सुंदर प्रस्तुति।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए तहेदिल से शुक्रिया।

    जवाब देंहटाएं
  13. बहुत सुन्दर संकलन आज का |मेरी रचना को शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद |

    जवाब देंहटाएं

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