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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

1306...रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर...

सादर अभिवादन।

आज मंगलवार है।  
निस्संदेह आप भाई कुलदीप जी को याद 
कर रहे होंगे। तकनीकी गड़बड़ियों के चलते आज कुलदीप जी के निर्धारित दिन मैं हाज़िर हूँ 
आपके लिये चुनिंदा रचनाओं के साथ- 


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"ऊपर से हो नारिकेल सा
अंतस नवनीत सा बहता है.
प्रीत पंथ का अथक पथिक 
गुह्यात गुह्यतम गहता है"..


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कुछ अधूरे लफ्ज़ टूटे और भटके राह में     
अधलिखे ख़त की कहानी और गहरी हो गई
रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर
दिन सलीके से उगा दिल को तसल्ली हो गई



हे वाग्देवी हे ज्ञान की सरिता 
ललित,निरंजन,शक्ति स्वरूपा
तुम्ही ज्योत्सना करती तम भंजन 
हर लो विकार कर दो मन कंचन 
ऋद्धि,सिद्धि,सुर,गुण तुम ज्योति 
काम,क्रोध मोह,लोभ को हरती 


करनाल में   पतंगबाजी  का  बसंत

करनाल को दानवीर कर्ण की नगरी कहा जाता है | महाभारत के प्रमुख पात्र कर्ण के नाम पर ही इसे करनाल नाम दिया गया है | करनाल के बीचोबीच स्थित बाजार को आज भी कर्ण गेट के नाम से जाना जाता है | करनाल में विभिन्न जातियों व धर्मों के लोग बड़े ही सौहार्द - भाव से मिलजुल कर रहते है | करनाल को हरियाणा की सांस्कृतिक नगरी भी कहा जाता है |



सलिल भैया का सबक है कि जिह्वा सरस्वती का घर है और झूठ जिह्वा का कूड़ा है । जहां कूड़ा रहता है वहां इंसान नहीं बैठ सकता तो माँ  सरस्वती कैसे बैठेगी ? अतः जो जितने समय झूठ बोलता है तत्काल उतने समय जिह्वा से सरस्वती विदा हो जाती हैं । इसके अलावा गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है- चरित्र से दूषित, फरेबी, तिकड़म से साधन और शक्ति सम्पन्न व्यक्ति की प्रशंसा करने से सरस्वती नाराज होती हैं । 'कीन्हे प्राकृत जे गुन गाना, ता धुनि लागि गिरा पछिताना'-मानस, बालकांड,11वीं चौपाई ।

हम-क़दम के अट्ठावनवें अंक का 
विषय है "पलाश"
"पलाश" शीर्षक से 
कविवर पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की कविता उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत है -  

आया था हरे भरे वन में पतझर, पर वह भी बीत चला।
कोंपलें लगीं, जो लगीं नित्य बढ़नें, बढ़ती ज्यों चन्द्रकला॥

चम्पई चाँदनी भी बीती, अनुराग-भरी ऊषा आई।
जब हरित-पीत पल्लव वन में लौ-सी पलाश-लाली छाई॥

पतझर की सूखी शाखों में लग गयी आग, शोले लहके।
चिनगी सी कलियाँ खिली और हर फुनगी लाल फूल दहके॥

सूखी थीं नसें, बहा उनमें फिर बूँद-बूँद कर नया खून।
भर गया उजाला ड़ालों में खिल उठे नये जीवन-प्रसून॥

अब हुई सुबह, चमकी कलगी, दमके मखमली लाल शोले।
फूले टेसू-बस इतना ही समझे पर देहाती भोले॥

लो, डाल डाल से उठी लपट! लो डाल डाल फूले पलाश। 
यह है बसंत की आग, लगा दे आग, जिसे छू ले पलाश॥
साभार- कविता कोश
अंतिम तिथिः 16 फरवरी 2019
प्रकाशन तिथिः 18 फरवरी 2019

अब आज्ञा दें। 
सादर। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

17 टिप्‍पणियां:

  1. कान दरवाज़े की कुंडी में ही अटके रह गए
    झपकियों ही झपकियों में रात कब की हो गई..

    कभी कभी ये रात बेहद लम्बी होती जाती है- बहुत सुंदर रचना और अंक। मेरे विचारों को स्थान देने के लिये धन्यवाद प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात..
    बेहतरीन प्रस्तुति
    आभार..
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  3. शुभ प्रभात
    बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाकारों को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. शुभ प्रभात आदरणीय |
    बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति |रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनायें
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति शानदार रचनाएं

    जवाब देंहटाएं
  6. सुप्रभात,
    एक और लाज़वाब पिटारा खोल दिया हैं आज,
    सब रचनाये बेहतरीन हैं

    रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर
    दिन सलीके से उगा दिल को तसल्ली हो गई

    वाह

    जवाब देंहटाएं
  7. सुप्रभात !
    बहुत सुंदर प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  8. सुन्दर संकलन आज की रचनाओं का ....
    आभार मेरी ग़ज़ल को यहाँ जगह देने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं
  9. बेहतरीन रचनाओं का संकलन
    आभार।

    जवाब देंहटाएं
  10. लाजवाब प्रस्तुतिकरण..बेहतरीन लिंक संकलन.....।

    जवाब देंहटाएं
  11. वाह लाजवाब संकलन सुंदर प्रस्तुति आदरणीय सर सभी रचनाएँ उत्क्रष्ट हैं...सभी को खूब बधाई
    हमारी रचना को स्थान देने हेतु हृदयतल से हार्दिक आभार
    सभी को सादर प्रणाम शुभ संध्या

    जवाब देंहटाएं

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