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गुरुवार, 24 जनवरी 2019

1287....कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया....

 सादर अभिवादन। 

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है? 

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-



जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है,
कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया।
अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल,
किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया।

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 इसी बीच रुदन का एक तीव्र स्वर उभरता है और मेरी तंद्रा भंग होती है. लोगों के आने का क्रम जारी है. बांस की खपाची से बनी शायिका पर उन्हें लिटा दिया गया है. ऊपर से एकरंगा का ओहार भी तान दिया गया है. उनके निष्प्राण किन्तु प्रदीप्त मुखमंडल पर फूलों के पराग भी निश्चेत लुढ़के हुए हैं और मेरी निश्चेष्ट आँखें एक बार फिर बड़का मामा की धराशायी देह में डूबती अतीत की गहराई में उतर जाती हैं.....


 

सुनाओ अखबार की खबरे कि
यहाँ बलात्कार, वहाँ कत्ल सरेआम हुआ


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आज की नारी यह मानती है कि वास्तव में कोई मालिक नहीं और कोई ग़ुलाम नहीं।  खत के अंत में यह लिखने की जरुरत नहीं है कि "तुम्हारी दासी"! आज की नारी, प्रेमचंद की ऐसी पात्रा नहीं है जो अपनी इच्छाओं का दमन करती हुई, चुपचाप सारे अन्याय सहती रहे। 


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21वीं सदी और ये वाक्य पढ़े लिखे लोग इनके पिता जिन्होंने संस्कृत और हिंदी में स्नातकोत्तर किया है और ये शब्द उनके मुंह से..
विस्मय नही मेरे चेहरे पर हृदय पर एक गहरी चोट लगी इसलिए नही मैं दोषारोपित हुई,अपितु इसलिए कि मेरी दादी की जीवनी उनकी दादी की सबके बहूओं की जीवनी,सबकी यही कहानी थी,और इतने सदियों बाद आज मेरी भी।

हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए

आज के लिये बस इतना ही 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

12 टिप्‍पणियां:

  1. खत के अंत में यह लिखने की जरुरत नहीं है कि "तुम्हारी दासी"!
    यह शुभकार्य कौन करेग? मैंने तो देखा कि उच्चशिक्षा प्राप्त महिलाएँ भी पति को घर का मुखिया मान उसकी फटकार को भी प्रेम समझ सहती हैंं। तब बात वे नारी जाति के अधिकार की नहीं, गृहस्थ जीवन के समझौते की करती हैंं। उनकी रचनाओं का जग में बड़ा नाम होता है,पर घर मे वह रद्दी कागज का चुटका होता है।
    जिन्हें घर के पुरुषों की विचारधारा बदलनी चाहिए,वे जग की स्त्रियों के अधिकार की बात करती है।
    नहीं समझ पाता कभी कभी ये नारी शक्ति क्या बात करती है।

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  2. सुंदर अंक, सभी को सुबह का प्रणाम, चिन्तन के लिंक पढ़ कर कोई सामग्री मिल ही जाती है मुझे। आभार आप सभी का।

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  3. शुभ प्रभात...
    उपयोगी अंक...
    आभार..
    सादर..

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  4. नारी की बदलती तस्वीर हमारे पंगु समाज को एथलेटिक बनाने जैसा रहेगा.
    बहुत अच्छी अच्छी रचनाओं का समावेश है..कुछ मार्मिक और कुछ जज्बे से भरी समाज की कुप्रथाओं पर चोट देती हुई.

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  5. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति रवींद्र जी।

    जवाब देंहटाएं
  6. अच्छी रचनाओं का समावेश के साथ आज की प्रस्तुति बहुत बढ़िया..
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  7. सुंदर प्रस्तुती
    उम्दा रचनाए
    मेरी रचना को यहाँ जगह देने के लिए आभार ........सहृदय

    ईवीएम का द्वंद्व
    दल दलदल
    भोली जनता

    लोकतंत्र

    चुनाव

    छल

    है? .....बहुत खूब आदरणीय ......यथार्थ !

    जवाब देंहटाएं
  8. शानदार प्रस्तुतिकरण उम्दा लिंक संकलन.... ।

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  9. उम्दा रचनाएं। मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, रवीन्द्र जी।

    जवाब देंहटाएं
  10. प्रभावशाली वर्ण पिरामिड के साथ लाज़वाब सारगर्भित रचनाओं का सार्थक संयोजन...बहुत सुंदर अंक है रवींद्र जी।

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  11. बहुत शानदार प्रस्तुति। बेहतरीन रचनाओं का संकलन है जो अलग-अलग तरह के विचारों से हमारा परिचय कराता है। लाजवाब उल्टा वर्ण पिरामिड है भूमिका में।

    जवाब देंहटाएं

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