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शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

399...हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जब एक लड़की से करुण रस के बारे में पूछा तो वह रो पड़ी

जय मां हाटेशवरी...

कहीं आप भूल तो नहीं गये?...
आज 19 अगस्त है...
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म दिवस...
आज की प्रस्तुति प्रारंभ करने से पहले...
पांच लिंकों का आनंद परिवार की ओर से...
हिंदी के इस चमकते सितारे को...
कोटी-कोटी नमन...

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जिनके बचपन का नाम बैजनाथ द्विवेदी था का जन्म श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 (19 अगस्त, 1907) को ओझवलिया, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पं. अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। माता श्रीमती ज्योतिष्मती थीं। 1927 ई. में श्रीमती भगवती देवी के साथ विवाह हुआ। इनके सात पुत्र-पुत्रियां थे।इन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से ज्योतिष और संस्कृत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1929 ई में संस्कृत साहित्य में शास्त्री और 1930 में ज्योतिष विषय लेकर शास्त्राचार्य की उपाधि पाई।
इससे आगे...


भीष्म को क्षमा नहीं किया गया
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक निबंध / विजय शंकर सिंह कुछ मैं और मेरे जैसे कुछ अन्य साहित्यकार चुप्पी साधे हैं। भविष्य इसे उसी तरह क्षमा नहीं करेगा जिस प्रकार भीष्म पितामह को क्षमा नहीं किया गया। मैं थोड़ी देर तक अभिभूत होकर सुनता रहा और मन में पाप बोध का भी एहसास हुआ। सोचता रहा, कुछ करना चाहिए, नहीं तो भविष्य क्षमा नहीं करेगा। वर्तमान ही कौन क्षमा कर रहा है? काफी देर तक मैं परेशान रहा – चुप रहना ठीक नहीं है, कंबख्त भविष्य कभी माफ नहीं करेगा। उसकी सीमा भी तो कोई नहीं है। पाच हजार वर्ष बीत गए और अब तक विचारे
भीष्म पितामह को क्षमा नहीं किया गया। भविष्य विकट असहिष्णु है। काफी देर बाद भ्रम दूर हुआ। मैं भीष्म नहीं हूं। अगर हिंदी में लिखने वाला कोई भीष्म हो जाता हो, तो भी मुझे कौन पूछता है? बहुत ज्ञानी गुणी भरे पड़े हैं। मुझसे अवस्था में, ज्ञान में, प्रतिभा में बहुत आगे। मुझे कोई डर नहीं है। ‘भविष्य’ नामक महादुरंत अज्ञात मुझे किसी गिनती में लेने वाला नहीं है। डरना हो तो वे ही लोग डरें, जिनकी गिनती हो सकती है। तुम क्यों घबराते हो, मनसा राम, तुम तो न तीन में, न तेरह में। बड़ी राहत मिली इस यथार्थ बोध से। मगर यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि थोड़ी देर के लिए ही सही, भीष्म मुझ पर छाए रहे।



हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जब एक लड़की से करुण रस के बारे में पूछा तो वह रो पड़ी
एक बार यूनिवर्सिटी में वाइबा लेने आए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। वाइबा में एक लड़की से उन्हों ने करुण रस के बारे में पूछ लिया। लड़की छूटते ही जवाब देने के बजाय रो पडी। बाद में जब वाइबा की मार्कशीट बनी तब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उस रो पडने वाली लड़की को सर्वाधिक नंबर दिया। लोगों ने पूछा कि, 'यह क्या? इस लड़की ने तो कुछ बताया भी नहीं था। तब भी आप उसे सब से अधिक नंबर दे रहे हैं?' हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा, 'अरे सब कुछ तो उस ने बता दिया था, करुण रस के बारे में मैं ने पूछा था और उस ने सहज ही करुण उपस्थित कर दिया। और अब क्या चाहिए था?' लोग चुप हो गए थे। हालां कि इस की पराकाष्ठा हुई जल्दी ही। अगली
बार वाइबा के लिए नामवर सिंह आए। कुछ 'होशियार' अध्यापकों ने लडकियों को बता दिया कि यह नामवर उन्हीं हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य हैं। अब जो भी लड़की आए, जो भी सवाल नामवर पूछें लड़की जवाब देने की बजाय रो पडे। नामवर परेशान कि यह क्या हो रहा है? अंतत: उन्हें हजारी प्रसाद द्विवेदी का वह प्रसंग बता दिया गया। लेकिन नामवर नहीं पिघले। रोने वाली सभी लडकियों को वह फेल कर गए। तो भी क्या था हम कोई नामवर सिंह के पास जा भी नहीं रहे थे। हम तो कबीर को परिभाषित और व्याख्यायित करने वाले, वाणभट्ट की आत्मकथा लिखने वाले सहृदय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास जा रहे थे।



जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं...
मैं सादगी देखकर दंग हूं। अब तो हाल यह है कि पहली बार विधायक बनकर लोग खदानें खरीद रहे हैँ। निर्दलीय मुख्यमंत्री ने सुना दक्षिण अफ्रीका में सोने की खान खरीद डाली थी। मेरे ही गृह राज्य का सीएम रहा था वह। और यहां, पांच बार सांसद चुना जा चुका शख्स हवाई चप्पल पहन रहा है! एसी के दूसरे दर्जे में सफर कर रहा है! चेहरे पर दबंगई का कोई भाव नहीं!


दूर जलता...एक उम्मीद का दीपक..
यूँ अब अपनों से कोई हिमायत की उम्मीद नहीं
पर गैरों में अब भी इन्सानियत नजर आती तो है..
कि कल शायद इक हाथ उजाले का बढ़ायेगा कोई..
इन अँधेरों को फिर इक नई सुबह दिलायेगा कोई...


राखी रक्षा बंधन और रिश्तें
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अपना अपना राग लिए सब अपने अपने घेरे में
हर इंसान की एक कहानी सबकी ऐसे गुजर गयी
उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं


कुछ रचनाएं...
बार-बार पढ़ने का मन करता है...
आज के अंक में भी...
एक बार फिर...
अवि‍स्‍मरणीय गीत....
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यह उपजा था
प्‍यार के सात रंगों के आने और
दर्द के समंदर के ठाठें मारने से
कैसी त्रासदी है
शरीर, मन और आत्‍मा की
अलग-अलग ख्‍वाहि‍शें होती हैं
एक दूसरे की इच्‍छा को दरकि‍नार करते


तलाश अभी भी है आजादी की
उन्होंने बोलना जारी रखा, ‘प्राण-रक्षा के लिए खाना बहुत जरूरी है और हमारे देश में खाने की आजादी-ही-आजादी है । संतरी से लेकर मंत्री तक, चपरासी से लेकर अधिकारी तक, छोटे बाबू से लेकर बड़े बाबू तक, ठेकेदार से लेकर कोटेदार तक, सेवादार से लेकर मेवादार तक, समाजसेवी से लेकर देशसेवी तक, चोर से लेकर पुलिस तक-सभी खा रहे हैं । चारा से लेकर अलकतरा तक,
टूजी से लेकर कोयला तक, हेलीकॉप्टर से लेकर तोप तक, साबुत चीजों से लेकर ताबूत तक- खाने की आजादी के चंद नमूने हैं ।’
‘सभी कहाँ खा रहे हैं?...पर सबके लिए आजादी दिख जरूर रही है ।’ मैंने बीच में बोलते हुए कहा, ‘भूखे पेट को भूखा रहने की आजादी है और भरे पेट को खाने की ।’
‘खाने के साथ पीना भी मूलभूत आवश्यकता है ।’ हमारी बात ने उनमें और जोश डाल दिया । वह हामी भरते हुए बोले, ‘बिल्कुल ठीक फरमाया आपने । खाना अटक न जाए, इसके लिए कुछ गटकना जरूरी होता है । सादा पानी प्रभाव में नगण्य होता है, इसीलिए रंगीन पानी की हर तरफ आजादी है । निषेध मजबूरी हो सकती है, पर छिपा कर पीने की पूरी आजादी है । सत्तानवीस इज्जत पी गए, नौकरशाह मर्यादा । हर तरफ ‘पानी’ की कमी पीने की आजादी का साक्षात प्रतिफल है ।’
‘ठीक कहा आपने । सादा पानी भले नसीब न हो, पर कोका-कोला गटकने की जबर्दस्त आजादी है।’ हमने एक बार फिर अपनी बात को टैग करते हुए कहा ।

                      
कल राखी बीत गयी...
अब रौनक है...
श्रीकृष्ण जन्मष्टमी की...
पर पांच लिंकों का आनंद को...
 प्रतीक्षा है...
कल की यानी अपने   चार सौवें  अंक की...
धन्यवाद।









9 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    अविस्मरणीय पण्डित हजारी प्रसाद जी
    उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक है
    अच्छा चयन है आपका
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    बहुत सुन्दर
    लिंको का चयन
    सादर

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति कुलदीप जी ।

    जवाब देंहटाएं
  4. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को नमन!
    बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति ..

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  5. पण्डित हजारी प्रसाद जी को नमन। बहुत बढ़ि‍यां लिंंक चुना है आपने। मेरी रचनाओं को स्‍थान देने के लि‍ए धन्‍यवाद

    जवाब देंहटाएं
  6. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को शत शत नमन...बहुत सुंदर उदाहरण ..रस सिद्धान्त की मार्मिकता
    का सहजता से वर्णन किया।प्रत्येक कवि,रचनाकार का अपना चिंतन ,मनन एवं अध्ययन क्षेत्र होता है ..भली भांति स्पष्ट हो गया।महान रचनाकारों को पुनः स्मरण करवाने हेतु बहुत आभार...

    जवाब देंहटाएं
  7. तलाश अभी भी है आज़ादी की ..बढ़िया यथार्थ अवलोकन...बेबाक सत्य...

    जवाब देंहटाएं
  8. तलाश अभी भी है आज़ादी की ..बढ़िया यथार्थ अवलोकन...बेबाक सत्य...

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  9. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को शत शत नमन...बहुत सुंदर उदाहरण ..रस सिद्धान्त की मार्मिकता
    का सहजता से वर्णन किया।प्रत्येक कवि,रचनाकार का अपना चिंतन ,मनन एवं अध्ययन क्षेत्र होता है ..भली भांति स्पष्ट हो गया।महान रचनाकारों को पुनः स्मरण करवाने हेतु बहुत आभार...

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