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बुधवार, 4 मई 2016

292....बन्ध जाते ख्वाहिशों के रेशमी सूत में.

सादर अभिवादन
एप्रिल जा चुका
मे भी चला जाएगा
नियम ही है
जो आता है
उसे जाना ही होता है....



स्तब्ध जलधि 
दूर छूटता कूल 
एकाकी मन ! 


दो  चार  बार  हम जो कभी हँस-हँसा   लिए
सारे  जहाँ  ने  हाथ  में  पत्थर   उठा   लिए,
रहते   हमारे   पास   तो    ये   टूटते    जरूर
अच्छा  किया  जो  आपने  सपने  चुरा लिए,
जब  हो  सकी  न बात तो हमने  यही  किया
अपनी  गजल  के  शेर  कहीं  गुनगुना  लिए,
अब  भी  किसी  दराज  में मिल जाएँगे तुम्हें
वो खत जो तुम्हें दे न सके लिख लिखा लिए।
- कुँअर बेचैन


न स्वप्न आने बंद होते है,
न स्वप्न कभी पूरे होते .
वो तो बस ...
आपको भगा भगा कर
थका कर 
कहीं ठंडी छाँव में
आपके सुस्ताने का इंतज़ार करते हैं.


हर भाग की 
अपनी भाषाएं हैं,
शिक्षा का कोई
अब आधार नहीं है,
धरा बंट चुकी है
कई भागों में...
जब से बंटा है
ये सब कुछ,
बंटा है तब से  
मानव भी  कई भागों में। 


पर वह मेरा नहीं था, यह कैसे मान लूँ ?
क्या तुम देवकी के नहीं थे ?
यशोदा के नहीं थे ?
राधा के नहीं थे ? .... 
यदि यही सत्य है तो लुप्त कर दो कहानियाँ 
क्योंकि,
सारी कहानियाँ भी तो यहीं बनी थीं 
यहीं रह गईं 
फिर कहना-सुनना ही क्या है !
कहो कृष्ण !!!


और अंत मे आज की शीर्षक रचना
डेरा डाले पलकों में
 पल-पल तुम्हारी,
गिनूँ थरथराहट
 पुतलियों की,
गोल-चन्द्राकार-पनैला,
तैरूँ, नील गगन में !
अगणित सपनों के मोती.
डूबते,तैरते,उतराते
और बन्ध जाते
ख्वाहिशों के रेशमी सूत में.
.......

आज यहीं तक
दें इज़ाज़त दिग्विजय को
फिर मिलते हैं...








7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर सूत्र एवं स्तरीय रचनाएं ! आज के चयनित सूत्रों में मेरी रचना 'पिघलती शाम' को सम्मिलित करने के लिये आपका बहुत-बहुत आभार दिग्विजय जी ! धन्यवाद !

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  2. बढ़िया हलचल प्रस्तुति
    आभार!

    जवाब देंहटाएं

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