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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

252...रंगों ने खूब मस्ती घोली है

सादर अभिवादन
होली तो आज हो ली
पर रचनाएँ जारी रहेंगी
एक सप्ताह तक...
भाई कुलदीप जी के कम्पयूटर को
बुखार आ गया है...डॉक्टर इलाज कर रहा है..

आज की रंगीन प्रस्तुति...

उमर हिरनिया हो गई, देह-इन्द्र-दरबार
मौसम संग मोहित हुए, दर्पण-फूल-बहार

दर्पण बोला लाड़ से, सुन गोरी, दिलचोर
अंगिया न सह पाएगी, अब यौवन का जोर


होली में सब प्यार से, भून रहे होलाक।
होली की ज्वाला जली, हुई होलिका खाक।।

जग में सज्जनवृन्द की, होती है मनुहार।
निश्छल लोगों को सभी, करते प्यार अपार।।

होली रे होली ...........
हुड़दंग मचाए,
बस्ती में सारे ,
रोके न रुके ,
अरे आज हम सारे|
होली रे होली .......

बाहर झांक कर कई दफा देख चुका हूं सिवाय एकाध बच्चे के कोई नजर नहीं आ रहा। 
ऐसा लग ही नहीं रहा कि आज होली है। न होली का हुड़दंग है, न रंग है, न उमंग। 
लोगों के चेहरे और कपड़े सूखे हुए हैं। टोलियां तो अब नजर ही नहीं आतीं।


ये है आज की शीर्षक रचना का अंश

होली है भई होली है 
रंगों ने खूब मस्ती घोली है

राधा और कान्हा का प्यार 
आ गया फागुन मेरे यार 

गोपियों संग हंसी ठिठोली 
भर गयी फूलों से सबकी झोली 

आज्ञा दें मुझे यशोदा को
धन्यवाद दें भाई कुलदीप को..

एक गीत तो बनता है आज













5 टिप्‍पणियां:

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