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सोमवार, 14 मार्च 2016

241..सभी नाकामियाँ अपनी उन्हें यूँ ही छुपाना है

सादर अभिवादन स्वीकारें
आलस्य काफी से अधिक खराब होती है
सोमवार से रविवार  
बस एक दिन सोमवार का
मेरे हिस्से में
बाकी दिन....

बातें बाद में   चलें.....

प्रिये सोचता था जब आयेगी होली
रंगूंगा तबीयत से प्रिया अपनी भोली ! 

छकाऊँगा जी भर तुम्हें कुमकुमों से
सताऊँगा मल-मल के चेहरा रंगों से !


एक घर है—जिसे घर की तरह
हर-रोज बु्हारती रहती हूं,मैं
पर मेरे ही पैरों में लगी धूल
वापस लौट आती है,फिर-फिर
समझदार बहुत हूं मै,कि
घर तो घर ही होता है

आह 
ये कसक तुम्हारे न होने की 
कैसे किसी अनाम क्षण में 
सहसा उफनती है 
देखे - भोगे सत्य को भुला कर 

तलहटी में फिर खिले हैं टेसू 
और लद चली हैं महुवे 
की डालियाँ। 
क्रमशः 
जुड़ से चले हैं टूटे हुए स्लेट, 
फिर खोजता है दिल 


और आज की शीर्षक कड़ी..
तमाशा जात मज़हब का, खड़ा करना बहाना है
सभी  नाकामियाँ अपनी  उन्हें  यूँ  ही छुपाना है

ढ़ले सब एक  साँचे में, नहीं  कोई अलग लगता
मुखौटों  में  छुपे  चेहरे,  ज़माने को  दिखाना है


आज्ञा दें यशोदा को









7 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी नवीन रचना को शामिल करने हेतु, मैं आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ। नमन सह - -

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  2. सुप्रभात
    सादर प्रणाम
    सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर हलचल आज की यशोदा जी ! इन चुनिन्दा लिंक्स के बीच आपने मेरी रचना को भी स्थान दिया हृदय से आभारी हूँ आपकी ! धन्यवाद !

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  5. अच्छी हलचल, सुंदर लिंक्स। मेरी रचना को मान और स्थान देने के लिए हृदय से आभार।

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  6. अच्छी हलचल, सुंदर लिंक्स। मेरी रचना को मान और स्थान देने के लिए हृदय से आभार।

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