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सोमवार, 28 सितंबर 2026

4878 ..थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम , तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी

 सादर अभिवादन


शायद आपको पता हो


रावण का जन्म त्रेता युग के आरंभिक चरण में आज से लगभग 23 लाख वर्ष पूर्व हुआ था। मृत्यु के समय उसकी आयु लगभग 6 लाख वर्ष थी। वास्तविक तिथि कोई ब्रह्म संवत काल गणना विधि का जानकार ही बता सकता है।
उसके पिता का नाम महर्षि विश्रवा और माता का नाम कैकसी था। विश्रवा ऋषि पुलस्त्य के पुत्र थे। ऋषि पुलस्थ ब्रह्मा के पुत्र, अर्थात आदि ऋषि माने जाते हैं।
उसकी माता कैकसी राक्षसराज सुमाली की पुत्री थी।
उसी सुमाली के देश को आज हम सोमालिया के नाम से जानते हैं। वहां के लोग
आज भी लूट-पाट को अपना धर्म मानते हैं।
उसकी पत्नी मंदोदरी मय दानव की पुत्री थी। वही मय दानव जिन्होंने बाद में
द्वारका और इंद्रप्रस्थ नगरी बसाई थी। वे माया सभ्यता के जनक थे जिसकी निशानियां
आज भी मेक्सिको में उपस्थित है।
-कोरा से   

देखिए रचनाएं....



कहते हैं कि पूर्वलिखित है,
किसके बंधन कहाँ बँधेंगे ?
किस रस्ते से मिले हमसफर,
किस दोराहे पर बिछड़ेंगे !
पूर्वलिखित ही अगर सभी कुछ,
फिर किसका वश चलता है !
जो जिसके लायक होता है,
वो ही उसको मिलता है !




हे जीवन,
इतना भी मत कस
अपनी मुट्ठी की गिरह,
कि भीतर बैठी चिड़िया
आकाश का नाम भूल जाए।

इतना भी मत खींच
दिनों की रस्सी,
कि उसकी रगड़ से
आत्मा की हथेलियाँ छिलने लगें।





संस्कृति का यह रूप तो हमारा नहीं है । पर बना दिया गया है । चन्दा इकट्ठा करके हर चार कदम पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के बाद भक्ति कम उच्छ्रंखलता अधिक दिखाई देती है ।  गणेश उत्सव हो या दुर्गा उत्सव ,जन्मदिन की पार्टी हो , शादी या फिर अन्य कोई आयोजन हो  लाउडस्पीकर पर तेज गीत बजाकर  रात रात भर गीत चलाए जाते हैं । अगर कोई आपत्ति करे तो “खुशी बर्दाश्त नहीं होती” या “धर्म विरोधी हो ” जैसे आरोप लग जाते हैं । मोहल्ले में एक आयोजक को कहा कि गीत बजाओ पर धीमी आवाज में , बच्चे पढ़ रहे हैं तब एक महिला तन कर आगई -–“थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम , तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी 






पितृ पक्ष केवल भय, अंधविश्वास या दबी हुई मान्यताओं का नाम नहीं है। यह मनोवैज्ञानिक हीलिंग, एपिजेनेटिक्स जागरूकता, पारिस्थितिक संतुलन और मौसमी स्वास्थ्य रक्षा का एक वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित ताना-बाना है। जब हम विज्ञान और संस्कृति के इस अनूठे संगम को समझ लेते हैं, तो ये परंपराएं बोझ न लगकर हमारे जीवन को संतुलित और समृद्ध बनाने का माध्यम बन जाती हैं।





मालूम नहीं .. तुम्हें मैं याद हूँ भी या नहीं ? .. तुम यदि आज पास होती, तो मैं तुम्हें इसी "पल्लवी" नाम से सम्बोधित करता या फिर बड़े लाड से "पुल्लु" बुलाता। है ना ? 

कभी तुम मेरी अध्यापिका बन जाती और कभी मैं तुम्हारा अध्यापक। है ना "पुल्लु" ?

कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार, तो क्या मुझे दुख होता ? 




सादर समर्पित
वंदन

3 टिप्‍पणियां:

  1. आभार अग्रवाल जी मेरे ब्लॉग को सम्मलित करने के लिए, सभी रचनाएं पठनीय और सारगर्भित है..

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