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सोमवार, 21 सितंबर 2026

4872...फिर भी हृदय विश्वास में पल रहा है


सोमवारीय अंक

सादर अभिवादन

देखिए रचनाएं....
राह देखते रहे



राह देखते रहे उम्र भर
क्षण-क्षण घडियां
घड़ी-घड़ी दिन
दिन-दिन माह बरस बीते
आंखों के सागर रीते--


उपासना एक्सप्रेस



अनायास उस अजनबी युवती को संबोधित करते हुए मेरे मुँह से निकल पड़ा है-
"आपनेर नाम टा की ?"। (आपका नाम क्या है ?)

वह मुस्कुराते हुए बोली - "मोनालिका .. कैनो ?" (क्यों ?)


वह अचरज भरे लहज़े में मुझसे पूछ बैठी- "आपनी की .. बंगाली, ना बिहारी ?"
(आप बंगाली हैं या बिहारी ?)



कन्या सोच, सोच, सोच


ये जग सारा
दिखता प्यारा
देता खूब निचोड़
कन्या सोच, सोच, सोच
कन्या सोच, सोच, सोच



हृदय में विश्वास पल रहा है


अस्थिर  होती  मति ,
अपना  परिचय  कहाँ   पाएगी   ?
क्षण - क्षण  बदलते  दृश्यों  में  
जगत  का  सार  देख  पाएगी ?
या  सत्य  की  तलाश  में  ,  
बेखबर  बटोही   बनकर  रहना  होगा ?
इतना  प्रबल  आवेग  है ,
हताशा  जब  घटा  घेर  रही  है
फिर  भी  हृदय  विश्वास  में  पल  रहा  है ,
हे  पथिक !  

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सादर समर्पित
वंदन

3 टिप्‍पणियां:

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