शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशरफी लाल मिश्र जी रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
भार्गव राम खण्डकाव्य - 58
अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,
अब थी निराश काशी नरेश बाला।
अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,
नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।
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810. प्यार (10 हाइकु)
कुछ बन्धन
हँस-हँस के जीते
गर प्यार हो।
4.
ज़ख्म फूलों से
प्यार में मिलता है
नादान हूँ न!
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सूखी बारिश
कहीं और सूरज वैसे निकलता ही नहीं।
चाँद में वह ख़ूबसूरती कहीं और नज़र ही नहीं आती।
खाने में वह ज़ायका नहीं मिलता,
बातों में वह बात नहीं होती,
और हँसी में वह खिलखिलाहट नहीं घुलती।
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स्तुति
और याद है
आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को
कैसे मारा था?
उस दिन के तो क्या ही कहने
आप अकेले ने दस-दस को गिराया था
तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा
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तुम्हारे बारे में
आज
सुबह नौ बजे वे नन्हे के घर जाने के लिए रवाना हुए। शाम को साढ़े छह बजे घर लौटे।
एक अनुवाद कार्य किया। कल छोटी बहन का जन्मदिन है, एक पुरानी कविता को आज के परिप्रेक्ष्य में दुबारा लिखा। दिन में दोपहर बाद
एक दूसरा हिन्दी नाटक देखा, ‘तुम्हारे
बारे में’ मानव कौल द्वारा
लिखित और निर्देशित भी।आधुनिक काल में स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर आधारित है।
सोनू को लेखक से मिलने का बहुत मन था, उसने
मानव कौल के साथ तस्वीर भी खिंचवाई।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
कुछ बन्धन
जवाब देंहटाएंहँस-हँस के जीते
गर प्यार हो।
बेहतरीन अंक
आभार वंदन