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बुधवार, 9 सितंबर 2026

4860..गुलज़ार बाक़ी है

।।भोर वंदन।।

 "लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से

बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से

आदत न रही कुछ लिखने की

निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से

कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम

मेरा धन है स्वाधीन कलम"

गोपाल सिंह नेपाली

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए...✍️

अच्छा है पर कभी कभी

बड़े - बुजुर्गों को समझाना, अच्छा है पर कभी कभी 

बच्चे को भी आँख दिखाना, अच्छा है पर कभी कभी 

ज्ञान - वमन अक्सर वो करते, जिनका ज्ञान अधूरा है 

ज्ञानवान का चुप रह जाना, अच्छा है पर कभी कभी ..

✨️

किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है..

 दर्द की तह में गुलज़ार बाक़ी है

मेरे ज़िगर में ख़ुशबू ए यार बाक़ी है 

तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो 

किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,..

✨️

दास्तान -ए-MRI!

 अब बहुत दिन हो गए, काफी समस्याएं जल्दी शुरू हुई थी लो ब्लड प्रेशर से चक्कर आना। इससे ही समस्याएं बढ़ी। 1 2 3 4 डॉक्टर को दिखाया न्यूरो सर्जन, न्यूरो फिजिशियन, ई एन टी और फिर फिजिशियन। सबका ट्रीटमेंट चल रहा था, 

✨️

घर में रहते घर ढहते, 

बाहर जाते पुल ढहते,

सड़कें धँसतीं, गड्ढे हँसते, 

वो केवल ‘फू-फा’ करते!

✨️

दोस्त बन के आइए 

कभी दोस्त बन के आइए 

जिगर में ही समाइये 

कसक सी उठती है दिल में 

यूँ न हमें आज़माइए 

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '


2 टिप्‍पणियां:

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