सादर अभिवादन
पिछला अंक
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन।।
एक किरण आई छाई,
दुनिया में ज्योति निराली,
रंगी सुनहरे रंग में
पत्ती-पत्ती डाली डाली।
एक किरण आई लाई,
पूरब में सुखद सवेरा,
हुई दिशाएं लाल
लाल हो गया धरा का घेरा।
एक किरण बन तुम भी
फैला दो दुनिया में जीवन..!!
सोहनलाल द्विवेदी
बुधवारिय प्रस्तुति में पढिए..
नीले नभ में देख तिरंगा
हर भारतवासी को गर्व है,
वीरों के बलिदानों से ही
आया आज़ादी का पर्व है !..
✨️
अनवरत यात्रा है,
यह जिंदगी हर पल।
नई आदतों के बनने और
पुरानी आदतों के ढहने की ।
जमती जाती हैं हर,
परवर्ती परत-दर-परत।
✨️
एक लड़की है...
जो हर पाँच मिनट में कुछ न कुछ भूल जाती है,
कभी फ़ोन कहाँ रखा, कभी चश्मा कहाँ छोड़ा,
कभी खुद ही पूछकर अपना सवाल तक भूल जाती है।
✨️
याद तो आई थी माँ
अपने जन्मदिन पर
तुझे याद कर मेरी
आँख भी भर आई थी,
जब यारों ने बाज़ार से लाकर
रेडीमेड केक खिलाया था..
✨️
अच्छा जिसका नसीब होता है, दोस्त उसके करीब होता है,
जो साथ हँसता और रोता है, सच्चा दोस्त वही होता है,
राह में पड़ते हो काँटे अगर, हटा के उन्हें फूल वो बोता है
दिल गर कभी उदास हो तो, साथ अपना भी चैन खोता है,
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
तृण पात सारे डोल रहें हैं
मन की परतें खोल रहें हैं
धीरे धीरे मद्धम मद्धम
कानों में कुछ बोल रहें हैं
बूंदों से आह्लादित मन
जंजीरें कितनी तोड़ रहे हैं
खुल रहे मन के बंधन आज, झींगुर प्रिय के गीत सुनाते
तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते
प्रेम प्यार और हँसी-खुशी से
जीवन लहर लहराने को।
अपनेपन का बीज हर एक
मन में बोते जाने को।
स्वार्थ का कूड़ा छींट-फटककर
जीवन से हटवाने को।
होने वाला है क्या?
जो हैं बिछड़ गए हमसे ।
करते होगें
याद हमें क्या ?
या ,फिर भूल गए होंगे
या ,फिर बस गई होगी उनकी
कोई नई दुनियाँ ......
वर्षा की बूँदों से सजी हुई है धरती,
काजल से काले बादल घिरें कभी,
घुल-घुल बरखा की लग जाए झङी।
स्मृतियों के मयूर तब पंख फैलाएंगे,
छम-छम करते मेघ मल्हार गाएंगे।
पानी के बुलबुले, बचपन की यादें,
काग़ज़ की नाव जल में तैराएंगे !
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सादर अभिवादन

सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन ।।
कौन शासन से कहेगा, कौन समझेगा,
एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है।
~ दुष्यंत कुमार
प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढ़ाते हुए..
कैसे बेच देते हैं लोग चंद सिक्कों में ज़मीर को,जहाँ फ़ायदा हो, वहीं झोंक देते हैं मोम-से शरीर को।कल दिल्ली के आंदोलन के बच्चे दिख रहे थे सभी को,आज झारखंड के बच्चे अकेले पार कर रहे शमशीर को।
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उंगलियों के बीच पहले उसे खूब मरोड़ा जाता है
तब कहीं जाकर तागे को सूई में डाला जाता है।
कर्णधार देश का जिसे बताते हैं सभी सयाने
उसी युवा को सड़क पर सरेआम रघोड़ा जाता है।
तुम्हारे इन निर्जीव तंत्रों से,
अब मुझे ईर्ष्या सी होने लगी है
मेरे हिस्से का स्पंदन, मेरे हिस्से की भोर,
यह निष्ठुर 'स्क्रीन' हर दिन निगलने लगी ह
तुम कहते हो, "यह हमारे कल के लिए है,"
स्वर्णिम भविष्य की इस क्रूर वेदी पर,
तुमने हमारे हँसते हुए आज को बलिदान किया
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