आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन।
चार दिन की बारिश में
गंदला जल हर सीमा लाँघ चुका,
नक्शे पर बनी रेखाएँ डूब गई।
खेत, आँगन, चौखट और सड़क—
सब एक ही विशाल, निष्ठुर नदी बन चुके हैं।
पेड़ों की डालियों से लटके
प्लास्टिक के डिब्बे, कपड़े, और भूली-बिसरी यादें।
दूर बहती जाती है किसी बच्चे की आधी डूबी गेंद,
पीछे छूट जाती है
सालों की हाड़-तोड़ कमाई।
राहत की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए
छतों पर कैद इंसान,
जहाँ भूख से ज़्यादा बड़ा है डर—
धीरे-धीरे चढ़ते पानी का।
पानी जब उतरता है,
अपने पीछे छोड़ जाता है
बदबूदार कीचड़, बीमारियॉं,
एक थका हुआ शहर और
शून्य के घेरे में छटपटाता
मजबूर आदमी...।
हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।
वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।
वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।
उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,
पर एक ऐसा दिल है
जिसमें छल की जगह नहीं,
सिर्फ़ अपनापन रहता है।
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है—
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।
तन यह माटी, मन पानी सा
दोनों आते-जाते रहते,
आत्म ज्योति से टिके हुए हैं
जिससे हम अनजाने रहते !
मन के पीछे चलता है तन
तन की सेवा में रहता मन,
सेवक बाहर, मालिक भीतर
कैसे पूर्ण लगेगा जीवन !







शुभ प्रभात
जवाब देंहटाएंपानी तो पूरे माह से दिख रहा है
बढ़िया संकलन
आभार
वंदन
सुप्रभात! कहीं अति वृष्टि कहीं अल्प वृष्टि, जलवायु परिवर्तन के कारण यह उलटफेर हो रहा है, सुंदर प्रस्तुति, आभार श्वेता जी !
जवाब देंहटाएंशानदार अंक
जवाब देंहटाएंसाधुवाद
बहुत बहुत आभार 🙏
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