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शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

4841....पर एक ऐसा दिल है...

 शुक्रवारवारीय अंक में
आप सभी का 
स्नेहिल अभिवादन।
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चार दिन की बारिश में

गंदला जल हर सीमा लाँघ चुका,

नक्शे पर बनी रेखाएँ डूब गई।

खेत, आँगन, चौखट और सड़क—

सब एक ही विशाल, निष्ठुर नदी बन चुके हैं।


​पेड़ों की डालियों से लटके

प्लास्टिक के डिब्बे, कपड़े, और भूली-बिसरी यादें।

दूर बहती जाती है किसी बच्चे की आधी डूबी गेंद,

पीछे छूट जाती है

सालों की हाड़-तोड़ कमाई।


​राहत की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए

छतों पर कैद इंसान,

जहाँ भूख से ज़्यादा बड़ा है डर—

धीरे-धीरे चढ़ते पानी का।


​पानी जब उतरता है,

अपने पीछे छोड़ जाता है

बदबूदार कीचड़, बीमारियॉं,

एक थका हुआ शहर और

शून्य के घेरे में छटपटाता

मजबूर आदमी...।



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आज की रचनाऍं- 


उसकी शरारतें किसी को सताने के लिए नहीं,
हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।

वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।
वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।

उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,
पर एक ऐसा दिल है
जिसमें छल की जगह नहीं,
सिर्फ़ अपनापन रहता है।



फिर सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।


तन यह माटी, मन पानी सा 

दोनों आते-जाते रहते, 

आत्म ज्योति से टिके हुए हैं 

जिससे हम अनजाने रहते !


मन के पीछे चलता है तन 

तन की सेवा में रहता मन, 

सेवक बाहर, मालिक भीतर 

कैसे पूर्ण लगेगा जीवन !







बड़ी दुश्मनी है तो देखेंगे हम भी 
कि तलवार मुझ पर चलाते हो कैसे 

जली जिंदगी पर न निकले फफोले 
बताओ हमें ग़म को खाते हो कैसे 

जहा‌ॅं पर बिताई थी बचपन की दुनियां 
उन्हीं बस्तियों को जलाते हो कैसे 


जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।
रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?


धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपनी गुल्लक तोड़ी और थोड़ा-सा तेल लेकर लौटी। दीपक जल गया। हवा ने टूटे तारों को छू लिया- धुँध में चित्र उभरने लगे।
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
सादर।

4 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    पानी तो पूरे माह से दिख रहा है
    बढ़िया संकलन
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात! कहीं अति वृष्टि कहीं अल्प वृष्टि, जलवायु परिवर्तन के कारण यह उलटफेर हो रहा है, सुंदर प्रस्तुति, आभार श्वेता जी !

    जवाब देंहटाएं

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