भोर वंदन
"सूरज की-
एक किरण पीपल के पत्ते पर ठहरी है !
एक किरण बेले के फूलों पर फिसली है !
एक किरण ताल की तरंगों पर थिरकी है !
एक किरण शिशु की दाँतुलियों पर बिहँसी है..!!"
त्रिलोचन
चलिए नियत समयानुसार आज की प्रस्तुति में ...
फोन आया है काकी का गांव से
इस बार अषाढ नहीं बरसा
खेत सब उपटे पडे हैं
इस बार आम भी नहीं फले थे
बिना खाद पानी के ..
✨️
ईथर की तरह विलीन हो जाएंगे
एक दिन सभी अंतर के सुप्त
दहन, उम्र से लंबी है
चाहतों का
सूचीपत्र,
अंतिम
बिंदु में भी लगे ठहरा हुआ सा
ख़्वाहिशों का एक बूंद इत्र,..
✨️
हमारे हाथ जले उन ही दीयों से 'ग़ाफ़िल'
जिन्हें हवा के थपेड़ों से हम बचाए हैं
-'ग़ाफ़िल'
✨️
अफसोस, कि अब ये
कैसा ज़माना आ रहा है,
बोलने को तो गद्दार ..
✨️
जड़ से सबको साफ़ किया
फिर कहते हैं माफ़ किया !
लाठी-गोली बच्चों को दी
कहते हैं इंसाफ़ किया।
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन
सुप्रभात! सुंदर भूमिका और सादगी भरे सूत्र
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