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शनिवार, 6 जून 2026

4765 ..हिंदू-मुस्लिम पुड़िया लेकर, भानुमती ये खोले पिटारा।

सादर अभिवादन 




चुपचाप बैठना पड़ता है
इतना चुप
कि भीतर गिरती
एक स्मृति की आवाज़ भी
अलग से सुनाई देने लगे।





तनाव चाहे जितना गहरा हो,
जीवन का सूरज डूबता नहीं,
एक नई सुबह की आस में
जीवन चलता रहता है।




कबीर की नज़र अचानक फ्लाईओवर की एक दरार पर पड़ी। मलबे और जहरीली मिट्टी के बीच एक नन्हा-सा हरा अंकुर सिर उठाए खड़ा था। कंक्रीट के उस मरुस्थल में वह जीवन की पहली दस्तक था।

“सर! देखिए!” कबीर उत्साह से चिल्लाया।

कमलजीत झुककर उस अंकुर को देखने लगे। उनकी आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। उन्होंने अपने वॉटर-पैक से कुछ बूँदें उसकी जड़ों में टपका दीं।

“इंसान के युद्ध ने शहर मिटा दिया, कबीर,” वे धीमे से बोले, “लेकिन प्रकृति हार मानना नहीं जानती। यदि हम अपनी बंदूकें हमेशा के लिए रख दें, तो यह खोया हुआ शहर फिर साँस लेना सीख सकता है।”





एक जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।



हिंदू-मुस्लिम  पुड़िया लेकर,
भानुमती  ये खोले पिटारा।
आगे नाथ और पीछे पगहा,
गड़बड़झाला, गड़बड़झाला।

हाय! कितनी बदल गयी यह,
संवादों की अपने दुनिया।
कल से आते- आते ‘आज तक’,
ख़बरनवीस बाजीगर बनिया! 


सादर समर्पित
सादर वंदन

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