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सोमवार, 25 मई 2026

4753...मानो यक़ीन, मुझको कभी घर नहीं मिला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.(सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन प्रकाशित रचनाएँ-

कभी घर नहीं मिला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी

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तपती गर्मी ,बचपन की यादें 
जलती तपती हुयी धूप से सब दुनिया अकुलाई।
कहीं किसी भी तरू का पत्ता कोई एक न हिलता
आग बरसती थी मानो तृण तृण कण कण था जलता।
तर हो गया पसीने से तन भीगे कपड़े सारे
घबरा गया पथिक झट उसने अपने वस्त्र उतारे ।
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आज की शायरी

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प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.

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क्या हम बंदरों की संतानें हैं?

विज्ञान के अनुसार, मनुष्य सीधे तौर पर आज के बंदरों की संतान नहीं है।  इसके बजायदूसरे शब्दों में कहें कि इंसान और आज के बंदर (जैसे चिम्पांजी) दोनों एक ही विलुप्त हो चुके प्राचीन 'वानर (Ape)' प्रजाति के वंशज हैं। लाखों वर्ष के क्रमिक विकास (Evolution) के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए हैं। मानव उत्पत्ति और विकास के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस प्रकार है:*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

2 टिप्‍पणियां:

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