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मंगलवार, 19 मई 2026

4747...मगर वो अतिप्रिय कभी न था...

 मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज की रचनाऍं- 



किसानों के कानों में बरखा के मोती,
कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं.

दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.

ख़ुदा की नहीं खा रहे हैं हमारी,
क़सम से हम उनकी क़सम हो रहे हैं.



उसके बिना किसी की शाम उदास न थी

वो जरूर उदास रहा 

सुनकर वे सब किस्से 

जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था

उसे कहा गया प्रिय

मगर वो अतिप्रिय कभी न था



वट वृक्ष सरीखा हो तुम्हारा रिश्ता

जङें गहरी हों इतनी थामे रहें सदा 


वरदान सी विराट वट की छत्रछाया 

यम को कर प्रसन्न तत्क्षण वर पाया




“यह धागा सिर्फ पति की लम्बी उम्र का नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, हमारा सम्मान और हमारे साथ के उस वचन का प्रतीक है, जिसे हर दिन निभाने का प्रयास हमें करना होगा।” बरगद के चारों ओर घूमते हुए नन्दनी बुदबुदा रही थी। 

“हे वटवृक्ष, हमारे रिश्ते की जड़ें भी इतनी ही गहरी होने में साक्षी रहना कि समय की आँधियाँ भी इन्हें हिला न सकें।” आरव ने पेड़ को प्रणाम करते हुए कहा।


परित्यक्ता नहीं... परित्यक्त 


रात भर रो-रोकर सूजी आँखों के साथ अगली सुबह  सना ने एक कठिन निर्णय लिया। उगते सूरज की फीकी किरणें कमरे में फैल रही थीं, लेकिन उसके भीतर सब कुछ राख हो चुका था।
वह प्रतीक के सामने जाकर दृढ़ स्वर में बोली,

"मैं अपने पति को किसी और के साथ साझा नहीं कर सकती। अगर तुम दूसरी शादी करोगे तो मैं तुम्हें तलाक दे दूँगी।"




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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9 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    बेहतरीन अंक
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही अच्छा संकलन है यह श्वेता जी। कृपया 'काव्य कूची' की रचनाओं को भी 'पांच लिंकों का आनंद में' स्थान देने पर विचार करें।

    जवाब देंहटाएं
  3. उत्कृष्ट लिंको से सजी लाजवाब प्रस्तुति
    मेरी कहानी को मंच प्रदान करने के लिए तहेदिल से आभार एवं धन्यवाद प्रिय श्वेता !

    जवाब देंहटाएं
  4. देर से आने के लिए खेद हैं, सुन्दर प्रस्तुति!!

    जवाब देंहटाएं
  5. श्वेता जी, आपकी कमी बहुत खल रही थी । आपके आने से अच्छा लगा । मन निश्चिंत हो गया। मन के कोनों में एक सुंदर जीवन को तलाशती रचनाओं से सजा यह अंक मन को भा गया । नमस्ते को जगह देने के लिए अत्यंत आभार।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपके इस स्नेह से मन अभिभूत है।
      सस्नेह
      सादर।

      हटाएं

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