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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

4712...प्रेम में व्याकुल हुआ मन

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
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*जो झुक सकता है वो झुका भी सकता है।
 जीवन लंबा होने की बजाए महान होना चाहिए। 
* कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।
 * एक महान आदमी एक प्रतिष्ठित आदमी से इस तरह से अलग होता है कि वह समाज का नौकर बनने को तैयार रहता है।
 * धर्म मनुष्य के लिए बना है न कि मनुष्य धर्म के लिए।

*देश के विकास से पहले हमें अपनी बुद्धि के विकास की आवश्यकता है।
आज
स्वतंत्र भारत के महान संविधान के रचयिता 
बाबा भीमराव अंबेडकर जी की जयंती पर 
पूरा भारत उन्हें याद कर रहा है।

किसान और फसल भारतीय संस्कृति में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। फसल के हर मौसम को देश के 
विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से उत्सव की तरह
मनाया जाने की परंपरा अनेकता में एकता का बेजोड़ उदाहरण है। इसी समृद्ध कड़ी में हर वर्ष 14-15 अप्रैल को 
विशेष रूप किस रूप में मनाते है आइये जानते हैं-
 पंजाब और हरियाणा में बैसाखी, असम में बोहाग बिहू,बंगाली समुदाय का पोइला बोइशाख, केरल में
 विशु कानी,तमिल में पुथंडु, बिहार,मिथिलांचल में सतुआनी... मुझे इतनी ही जानकारी थी अगर आपको 
 इस संबंध में कुछ और पता है तो कृपया जरूर साझा करें।
क्षमा चाहेंगे
 आज भूमिका काफी लंबी हो गयी है।
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आज की रचनाऍं- 


लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।


 मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 


प्रेम  की  सूक्ति  रही   ,क्यों  प्रेम  से  भयभीत  है 
प्रेम  निर्मल  भावना  है , ईश की  यह  प्रीत  है 

प्रेम  न  उन्माद  होता , न  हार  होता  जीत  है 
प्रेम  में  व्याकुल  हुआ  मन, प्रेम  आकुल चित है 

प्रेम  से  रहना  पड़ेगा,  प्रेम  से  बढ़ना  पड़ेगा 
प्रेम  की  ताकत मिली तो ,जीत  हुई  निश्चित  है 


ब्रह्म कमल की खुशबू इसमें 
गंगा निर्मल बहती है,
भक्ति भाव से सरयू माता 
रामकथा को कहती है,
राधा जी के संग स्याम जहाँ 
निधि वन में रास रचाते हैं.






अपने इसी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वह बोले कि बताओ तो जरा- बनारस से चुनाव जीते हैं और दिन रात योगा दिवस की रट लगाते हैं। यह बनारस का और बनारसी पान का सरासर अपमान है। इतना कहते हुए उनके भीतर का नेता जागा और वो कहने लगे कि या तो बनारस से इस्तीफा दो या योगा बैन करो। घँसु ने भी सदा की तरह हाँ मे हाँ मिलाई। तिवारी जी ने तब तक सुबह सुबह हुए पान के नुकसान और कुर्ता खराब हो जाने के लिए योगा को गरियाते हुए नया पान मुंह में भर लिया। अब वे कुछ घंटे मुंह में पान घुलाएंगे और मौन चिंतन में डूबे रहेंगे।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. स्वतंत्र भारत के महान संविधान के रचयिता
    बाबा भीमराव अंबेडकर जी का वंदन
    सुंदर अंक दिया आपने आज
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही अच्छा संकलन। सभी रचनाएं अच्छी हैं। मेरी रचना को स्थान देने हेतु धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. सभी रचनाएं सुंदर और अच्छी है।

    जवाब देंहटाएं
  4. प्रभावशाली भूमिका के साथ पठनीय लिंक्स का चयन, बहुत बहुत आभार श्वेता जी!

    जवाब देंहटाएं

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