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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

4656... जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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मौसम बदल रहा है। माघ की शीतल छुअन
 और फागुन की हल्की मीठी-सी आँच के मध्य खिलते पलाश कितने मनमोहक लगते हैं न...।

पिघल रही सर्दियाँ
झर रहे वृक्षों के पात
निर्जन वन के दामन में
खिलने लगे पलाश

सुंदरता बिखरी फाग की
चटख रंग उतरे घर आँगन
लहराई चली नशीली बयार
लदे वृक्ष भरे फूल पलाश।
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आज की रचनाऍं- 


दिल अगर टूटे तो धड़कन कम नहीं होती
हर किसी दर्द का मतलब बुरा नहीं होता
 

खामोशी भी कभी छेड़े मधुर सरगम को
हर किसी साज़ में होना तम्बूरा नहीं होता
 

जिसे पा लो तो कई बार क़दर खो जाए
हर कोई ख़्वाब हक़ीक़त में पूरा नहीं होता




कितना बदल  जाता  है
और  मैं  हारती  हूँ 
पर  मुझे  स्वीकार  तो  करना  है
ऋतु परिवर्तन  सदा  ही  रहा
इस जन्मदिन  बस  चाहूँ  यहीं
कोई  लाकर  दे  दे  मुझे  बचपन  का  वो भोलापन  फिर  वहीं ।


यह प्लेटफ़ॉर्म कम, चलती-फिरती प्रदर्शनी अधिक है। यहां लोग बोलते कम हैं, दिखाते अधिक हैं। शब्द छोटे हुए, स्टोरी चौबीस घंटे में समाप्त होने लगी, और धैर्य पंद्रह सेकंड का रह गया।
मैंने भी सोचा कला से जुड़े लोगों को फ़ॉलो करना चाहिए, उन्होंने भी किया... एक परस्पर सम्मान जैसा भाव बना।
पर कुछेक को जैसे ही फ़ॉलो बैक किया, इनबॉक्स ने फिर दस्तक दी,
“हाय…”
संस्कारों ने कहा - नमस्ते लिख दो।
मैंने लिखा।
उत्तर आया — “हाँ, तो कुछ बोलो!!!”
अब यह आधुनिक संवाद शास्त्र का नया सूत्र है,
प्रारंभ वह करेगा, विस्तार आप करेंगे।
उत्सुकता उसकी होगी, उत्तरदायित्व आपका।




दशकों के अंतराल के बाद सब कुछ बदल गया है, शिक्षा का स्वरूप, शिक्षा का तरीका और उसकी विभिन्न शाखायें। अपने सपनों के लिए जहां मेडिकल के क्षेत्र में सिर्फ एमबीबीएस करना ही एकमात्र विकल्प था, सलेक्शन नहीं हुआ तो लोग उसको फेलियर समझते थे लेकिन आज इतने सारे विकल्प सामने आ चुके हैं कि प्रगति के तमाम रास्ते उन्हें उच्च पदों तक पहुंचा देते है। आप अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाइए और उन्हें अपनी इच्छानुसार करियर बनाने दीजिए।



चाचा ने एक लंबी आह भरी, जैसे शगुन की बात ने उन्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई हो. "बेटा, तुम अभी छोटी हो. तुम जिसे 'खुलापन' कहती हो, वह हमारे खानदान में 'मर्यादा' का उल्लंघन माना जाता है. खैर, तुम कह रही हो तो मैं ध्यान रखूँगा. अब मैं इतना भी पत्थर-दिल नहीं हूँ जितना तुम मुझे समझती हो. नीतू का ध्यान तो तुमसे ज्यादा मुझे है, आखिर हमारे वंश की बेल उसी के सहारे आगे बढ़ेगी. मेरा वंश तो उसी से आरंभ होने वाला है."

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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4 टिप्‍पणियां:

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