शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में आज पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर
प्रकाशित पाँच रचनाएँ-
मिटे विषमता, हर भेद मिटे
दुनिया से
हर इंसान, इंसान की क़ीमत
जाने,
दिल की गहराई में झांक सके मानव
नहीं किसी को, कभी भी पराया
माने!
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कुछ दिनों के
बाद
पीले फूल महकेंगे,
खुशबुओं का
ख़त लिए
फिर भ्रमर बहकेंगे,
फिर यही
मौसम लगेगा
इस धरा का भूप.
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जाते-जाते उन्हें गाँधी मैदान के पश्चिमोत्तर छोर पर तथाकथित महात्मा गाँधी की मूर्ति के चबूतरे के पास कुछ लोगों की झुण्ड बैठी दिखाई दे रही है। वो लोग वहाँ ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे करताल और ढोलक की शोर से प्रतियोगिता करते हुए गला फाड़-फाड़ कर हनुमान चालीसा गा रहे हैं। उन सभी की मिलीजुली आवाज़ उन दोनों को विचलीत कर रही है- "जै जै हनुमान गोसाईं.. "-और केवल उन दोनों को ही नहीं वरन् गाँधी मैदान में सभी शांतिप्रिय टहलने वाले लोगों को भी और बैठ कर योग या ध्यान लगाने वाले लोगों के साथ-साथ सुबह-सवेरे पक्षियों के कलरव को भी।
जी ! .. सुप्रभातम् सह मन से नमन आपको एवं हार्दिक आभार आपका .. हमारी बतकही को यह मंच प्रदान करने हेतु ...
जवाब देंहटाएंसुंदर संकलन
जवाब देंहटाएंयहाँ मेरे ब्लाग अनवरत को शामिल करने के लिए आभार.
जवाब देंहटाएंआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
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