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शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

4017....जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ....

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।

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आप सभी को गणतंत्र दिवस की
 हार्दिक शुभकामनाएँ।

राष्ट्र बलिदानों का कर्ज़दार है 
करबद्ध नत हिय श्रद्धाहार है।
प्रथम नमन है वीर सपूतों को
जो मातृभूमि के खरे श्रृंगार हैं।


विविधतापूर्ण संस्कृति से समृद्ध हमारे देश में अनेक त्योहार मनाये जाते हैं। बहुरंगी छवि वाले हमारे देश के राष्ट्रीय त्योहार ही हैं, जो जनमानस की एकता का संदेश प्रसारित करते हैं। भारत ने वर्षों संघर्ष करने के बाद आजादी हासिल की। २६जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन हमारा संविधान १९५० में लागू हुआ। यह  वो लिखित दस्तावेज़ है जिसमें हर एक आम और ख़ास के अधिकार और कर्तव्य अंकित है। 

 

"गणतंत्र का मतलब एक ऐसी प्रणाली जो आम जन के सहयोग से विकसित हो।"


"गणतंत्र यानि एक ऐसा शासन जिसमें  निरंकुशता का अंत करके आम जनमानस के सहमति और सहयोग से जनता के सर्वांगीण विकास के लिए शासन स्थापित किया गया।"

"गणतंत्र मतलब हमारा संविधान,हमारी सरकार हमारे अधिकार और हमारे कर्तव्य"


हमारा संविधान हमें यह याद दिलाता है कि हम सभी एक समान और एक ही देश के नागरिक हैं। हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अगली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भविष्य बनाना है।

राष्ट्र निर्माण की समसामयिक चुनौतियों की चर्चा करने का उपयुक्त  मौक़ा तो  गणतंत्र दिवस ही है .

हम देश के नागरिकों को मिला, क्या मिल रहा, क्या खोया क्या पाया,

यह विश्लेषण और आलोचनात्मक बहस

 कभी नहीं समाप्त होना चाहिए,

नाउम्मीदी और असंतोष से उपजा संघर्ष

नयी संभावनाओं की राह बनाते है;

पर आज का पावन दिन

स्वतंत्र भारत के संविधान के द्वारा

 हम नागरिकों को प्राप्त अपने 

अधिकारों एवं कर्तव्यों की

खुशियों को महसूसने का है।


हम एक लंबा सफर तय कर चुके हैं, और आज भारत एक मजबूत और विविध अर्थव्यवस्था, एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और एक जीवंत नागरिक समाज के साथ एक संपन्न लोकतंत्र के रूप में खड़ा है। तो चलिए हम सभी जाति ,धर्म , सम्प्रदाय और भाषाई विभाजन से ऊपर उठकर नागरिक बोध को क्रियाशील करें ताकि हम अपने देश अपने समाज के उन्नति में, नवनिर्माण में अपना योगदान दे सकें।


"जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी।"


आइये देशभक्ति के रंग में रची आज की रचनाएँ पढ़े-



महापुरूषों के स्वेद से,
मकरन्द यह निकला है।
योद्धाओं के सोणित से, 
हमें लोकतंत्र मिला है।।

चित से उन महामानवों के,
बलिदान का गुणगान करें।
लोकतंत्र के महाग्रंथ का,
अन्तःकरण से सम्मान करें।।

आ लौटकर कभी तो...



साया न साय-दार दरख़्तों के क़ाफ़िले
आ फिर उसी पलाश के दहके चमन में आ
 
भेजा है माहताब ने इक अब्र सुरमई
लहरा के आसमानी दुपट्टा गगन में आ


आँख मिलाता सूरज से 
यह आँधी से टकराता ,
युद्ध काल में प्रलय
शांति में सबकी जान बचाता,
अनगिन वीर,शहीदों का यह
स्वप्न और बलिदान है ।



देखो ये उन्मुक्त मन,
आकर खड़ा हो सरहदों पे जैसे,
लेकिन कल्पना के चादर,
आरपार सरहदों के फैलाए तो कैसे,
रोक रही हैं राहें
ये बेमेल सी विचारधाराएं,
भावप्रवणता हैं विवश,
खाने को सरहदों की ठोकरें,
देखी हैं फिर मैने विवशताएँ,
आर-पार सरहदों के,
न जाने क्यूँ उठने लगा है,
अंजाना दर्द कोई
इस सीने में..!



काजल है
धुलाई है
निरमा है
सफेद है
जल है
सफाई है

दावेदारी है
दावेदार हैं
कई हैं
प्रबल हैं



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
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वंदे मातरम्!!!


4 टिप्‍पणियां:

  1. आप सभी को गणतंत्र दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाएँ।
    बेहतरीन अंक
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
    बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. भावभीनी हलचल … आभार मेरी ग़ज़ल को शामिल करने के लिए …

    जवाब देंहटाएं
  4. गणतंत्र दिवस पर सभी के लिए शुभकामनाएं | आभार श्वेता जी |

    जवाब देंहटाएं

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