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शुक्रवार, 16 जून 2023

3790. ..प्रार्थनाएँ प्रेम की पर्यायवाची हैं …..

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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कभी जब मन उदास हो तो  कुछ भी नहीं अच्छा नही लगता और कभी नभ में उड़ता अकेला पक्षी भी मन को आशा से भर देता है। इसी तरह किसी की लिखी अच्छी, रौशन बातें पढ़कर भी मन उत्साह से भर सकता है। 
नकारात्मकता की भीड़ को परे धकेलकर
आइये क्यों न कुछ सकारात्मक विचारों को आत्मसात करें-
अपने जीवन में अच्छे बुरे बदलाव का कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ हम स्वयं होते हैं। दुनिया हमारे अनुसार चलेगी ऐसा सोचने से बड़ी बेवकूफी कुछ नहीं है।
कहीं पढ़ा था-
"जब आप उड़ने के लिए पैदा हुए हो, तो जीवन में रेंगना क्यों चाहते हो?"
“तुम सागर की एक बूंद नहीं हो। तुम एक बूंद में सारा सागर हो।”
"अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! बादलों की बारिश ही फूलों को बढ़ने देती है, उनकी गर्जना नहीं।"
दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।
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 आत्माओं के मौन आलाप के मध्य
ब्रह्मांड की संपूर्ण ऊर्जा पवित्र प्रार्थनाओं में
एकत्रित होती  रहती है

और क्या दे पाएगा तुमको भला यह मन फकीरी,
बस दुआओं में बसी है हम फकीरों की अमीरी,
शब्दकोशों में कहाँ इस अर्थ को तुम पा सकोगे,
प्रार्थनाएँ सब मेरी हैं प्रेम की पर्यायवाची  !


भूलेगी नहीं कभी
गिलहरी की पीठ पर रेखा की तरह,
निबौरी और सरसों फूली
गाँव की बचपन की तरह


उड़ते काग़ज़ों को दोबारा
समेटने में बहुत हिम्मत चाहिए ।
और उन नीम पीपल सागोन की 
गवाही अब भी बदली नहीं है ।
उन सब तारीख़ों को उनने 
अपने वलय में समेट रखा है ।
कहते हैं पेड़ के वलय से 
पेड़ की उम्र का पता जो चलता है ।


किसी हृदय का यह विषाद है, 
छेड़ो मत यह सुख का कण हैं। 
उत्तेजित कर मत दौड़ाओ, 
करुणा का विश्रांत चरण हैं। 

परिंदों ने आ कर कहा सब हरा है.
गगन से भी ऊँचा गगन दूसरा है.

उजाला कहाँ ले के आते हैं जुगनू,
चमकना ही उनका उमीदों भरा है.


कल, कल करते, आज 
हाथ से निकले सारे, 
भूत भविष्यत् की चिंता में 
वर्तमान की बाज़ी हारे, 
पहरा कोई काम न आया 
रसघट रीत चला 
जीवन बीत चला 

पनघट पर आती-जाती  ओरतें.....
खेतों की हरियाली .......
झूमती कलियां - खिलतें फूल...
रम गया मन, चित्रों को .........
केनवास पर बनाने में 
सधे हाथों ब्रस चल पड़ा....
कुछ अंतराल के बाद.....
ब्रस रोक कर देखती हूँ
केनवास पर की गई अपनी चित्रकारी,
स्तब्ध रह जाती हूँ.......


और चलते-चलते
क्या अपने कभी कोशिश की आँसुओ की ज़बान पढ़ने की कोशिश की हैं?-

इसके सामान्यतया तीन रूप होते हैं ! पहले हैं बेसल आंसू ! जो आंखों में नमी तथा स्नेहन की स्थिति बनाए रखते हैं, जिससे आँख साफ रहती है और आंखों का सूखेपन से होने वाले नुक्सान से बचाव होता है ! दूसरे होते हैं रीफ्लेक्स आंसू ! वह जल जो कभी धूल-कण या किसी कीड़े वगैरह के आँख में पड़ जाने से आंखों भर आता है, जिससे अवांछित वस्तु आँख से बाहर आ जाती है और तीसरा जो सबसे अहम् है, वह है साइकिक आंसू ! रुदन-समय पर बहने वाला रूप ! आंसू  हमारी मनोदशा को भी उजागर कर देते हैं ! दुख या सुख में निकलने वाले आंसू जाहिर कर देते हैं कि व्यक्ति खुश है या दुखी ! इसीलिए शायरों ने इन्हें दिल की जुबान कहा है ! वैसे बीमारी तथा भोज्य पदार्थ की तीक्ष्णता इत्यादि के कारण भी यह आंखों से बहने लगते 

 आज के लिए इतना ही

कल का विशेष अंक लेकर

आ रही हैं प्रिय विभा दी।



9 टिप्‍पणियां:

  1. दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।
    लाजवाब अंक
    आभार
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. “तुम सागर की एक बूँद नहीं हो। तुम एक बूँद में सारा सागर हो।”

    -वाह:
    उम्दा लिंक्स का चयन
    शुभकामनाएँ

    जवाब देंहटाएं

  3. "जब आप उड़ने के लिए पैदा हुए हो, तो जीवन में रेंगना क्यों चाहते हो?"
    “तुम सागर की एक बूंद नहीं हो। तुम एक बूंद में सारा सागर हो।”
    "अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! बादलों की बारिश ही फूलों को बढ़ने देती है, उनकी गर्जना नहीं।"
    दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।"
    सच! उदासी के आलम में कुछ ऐसा पढ़ना प्रेरणा से भर देता है।
    आभार बहुत आभार सखी । आपके श्रमसाध्य परिश्रम को नमन।

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  4. बहुत अच्‍छी हलचल प्रस्‍तुति

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर सकारात्मक विचारों से सजी भूमिका एवं बहुत अच्छे लिंक। सादर धन्यवाद पाँच लिंकों का। प्रिय श्वेता को विशेष स्नेह व आभार इस रचना को शामिल करने हेतु।

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  6. बहुत सुंदर संकलन,मेरी रचना को स्थान देने पर बहुत बहुत आभार आपका ।

    जवाब देंहटाएं
  7. प्रिय श्वेता,एक सकारात्मक प्रस्तुति पर आकर बहुत अच्छा लगा।कितनी अच्छी बातें लिखी हैं तुमने।मन को सही दिशा में मोड़ कर जीने में अलग ही आनन्द निहित है।सच है अपनी उड़ान भरकर जीने की बात ही और है।रेगंने में कुचले जाने का डर बहुत बड़ा है।अपना अन्तर्मन प्रसन्न है तो हर शै में आनन्द नज़र आता है।आज की सभी रचनाएँ बहुत ही भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी लगी।और प्रिय मीना की रचना से ली गई शीर्षक पंक्ति लाजवाब है।सभी रचनाकारों को बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं।तुम्हें आभार और प्यार एक बढ़िया संकलन के लिए।अब अपने ब्लॉग को भी धन्य करो।♥️♥️

    जवाब देंहटाएं
  8. दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।

    सारगर्भित सकारात्मक भूमिका के साथ लाजवाब प्रस्तुति...., सभी लिंक उम्दा एवं पठनीय ।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।

    जवाब देंहटाएं

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