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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

3133...कहो न कौन से सुर में गाऊँ

शुक्रवारीय अंक में मैं
श्वेता 
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
करती हूँ।

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जीना भी अजीब है, कभी खेल है ,कभी कला है कभी एक्टिंग है, कभी कुछ है ,तो कभी कुछ !! इस जीवन में हर पल को आना है और तत्क्षण ही चले ही जाना है, एक-एक पल करके समय हमको गुजारता जाता है और हम समय को !!

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गर जीना है स्वाभिमान से
मनोबल अपना विशाल करो
न मौन धरो, ओ तेजपुंज
अब गरज उठो हुंकार भरो।
बाधाओं से घबराना कैसा?
बिना लड़े मर जाना कैसा?
तुम मोम नहीं फौलाद बनो
जो भस्म करे वो आग बनो
अपने अधिकारों की रक्षा का
उद्धोष करो प्रतिकार करो।
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आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-

कहो न कौन से सुर में गाऊँ

जाने 'उसने' कब, किसको,
क्यों, किससे, यहाँ मिलाया !
दुनिया जिसको प्रेम कहे,
वो नहीं मेरा सरमाया !
जाते-जाते अपनेपन की, 
सौगातें दे जाऊँ !
कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ? 


मौसम में मधुमासी



धानी चुनर पीत फुलवारी
धरा हुई रसवंती क्यारी।
जगा मिलन अनुराग रसा के
नाही धोई दिखती न्यारी‌।
अंकुर फूट रहे नव कोमल
पादप-पादप कोयल रागी।।




कभी तन की भूख
कभी मन की भूख
कभी धन की भूख
सब कुछ पाकर भी
सब कुछ पाकर भी
तृप्त न हो पाया

पिया बोले न

तरसे नयनवा
उनके दरस को ...
आएंगे साजन
कौन बरस को...
अंबर बरसे 
धरती तरसे 
पुरवा सयानी 
इत उत भटके 
पीहू पुकारे 
घर के  दुआरे 





वनगमन, पर दोष किसका?

राम का वन जाना मुझे असाध्य कष्ट देता है, जितनी बार प्रसंग पढ़ता हूँ, उतनी बार देता है। क्योंकि मन में राम के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा है। बचपन से अभी तक हृदय यह स्वीकार नहीं कर सका कि भला मेरे राम कष्ट क्यों सहें? राम के प्रति प्रेम और श्रद्धा इसलिये और भी है कि राम पिता का मान रखने के लिये वन चले गये


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कल का विशेष संकलन लेकर

आ रही हैं प्रिय विभा दी

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