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शनिवार, 26 दिसंबर 2020

1989...अमलताश

अमेरिका में थैंक गिविंग से न्यू ईयर तक हॉलीडे

चलिए इस साल मैं भी छुट्टी पर चलती हूँ.. सब ठीक रहा तो अगले साल मिलेंगे.... 

जो जितना तप जाता है ।

वो स्वर्ण चमक पाता है ।

सच्चाई परखना हो तो निरखना

अमलताश

थर –थर कंपाती शीत लहरी हो,

आंधी हो या झंझावत का प्रबल आघात,

मैं सब सहता रहा चुपचाप,

मैं रहा दृढ और स्थिर चित्त,

मुझे पता था ये सब मेरे जीवन

में आने वाली बहार को छीन नहीं पायेंगे,

 मैं और तुम या हम

शब्दों का झंझावात है क्या उलझना

मुझे बन्धनों में ना बांधों

ये मेरा अन्तिम जन्म ही भला

पर अपने अगले 6 जन्मों तक

मुझे याद जरूर रखना

मैं कहती हूँ याद रखोगे ना?

 ||ऐसा करो ||

तुम ही नहीं 

ऐसे और भी 

कुछ समय तक रहे 

मेरे प्रेम में 

और भी आये कुछ दिनों के लिए 

अपनेपन का उपहार लेकर 

अंतर्मन गहराई में

वो भी चाहता है...

कि कभी कोई उसके लिये भी,

वक्त निकाले

उसे सुने और समझे,

मन की बात करते तो सब हैं...

पर इसे आज सुनता कौन है?

झंझावात

रत्न जडित स्वर्ण सिंहासन ,

मुक्ता मणियों के उर हार !

शीश मुकुट बहु बेशकीमती ,

सब हो गए हैं क्षार क्षार !

दुनियां वालो देखो नाटक ,

नियति नटी के नर्तन का !

><><><><><

पुन: भेंट होगी...

><><><><><

7 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात दीदी..
    सादर नमन..
    बेहतरीन प्रस्तुति..
    सादर नमन..

    जवाब देंहटाएं
  2. हमेशा की तरह सराहनीय संकलन दी।
    सभी रचनाएँ बहुत अच्छी हैं।
    सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  3. आने वाले समय में भी लिंक्स यूं ही खुशगवार रहें

    जवाब देंहटाएं
  4. सभी रचनाकारों को को सुप्रभात तथा सुंदर प्रस्तुति के लिए बहुत आभार आदरणीया

    जवाब देंहटाएं

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