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बुधवार, 8 जनवरी 2020

1936..जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर तो अवध की गलियों में आ जाना..


।।भोर वंदन।।
"जिस समय में

सब कुछ
इतनी तेजी से बदल रहा है
वही समय
मेरी प्रतीक्षा में
न जाने कब से
ठहरा हुआ है !
उसकी इस विनम्रता से
काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव
कुछ अधिक
गहरा हुआ है ।"
कुंवर नारायण

जी, काल के प्रति सम्मान-भाव और प्रतिक्षा सभी को है..कि हमारे आसपास की घटनाएं कुछ दिनों की उथलपुथल है..फिर अमनप्रीत होगी..
अब नजर डाले शामिल लिंकों पर..✍

💠💠



जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर
तो अवध की गलियों में आ जाना
और चाहते हो गर मुस्कुराना तो
दिल -ए-लखनऊ से दिल लगाना।
💠💠


आ० संजय कौशिक 'विज्ञात जी की नवगीत..
प्रीत अवगुंठन हटा कर 
खिलखिलाई रात भर

बैठ तरुवर ज्यों चकोरी
चाँदनी बिखरी छटा में 
शाख-पल्लव-ओट में थी
उमड़ती काली घटा में 
एकटक नैना निहारें 
रश्मियों की घन लटा में


💠💠



कांटों पे खिलने की चाहत थी तुझमें,
राह जैसी भी रही हो चला करते थे ।



न मिली मंज़िल ,हर मोड़ पर फिरभी

अपनी पहचान तुम बनाया करते थे।..
💠💠


जैसे अम्बर में चमकता आफताब  है!
गुलशन में फूलो  का  राजा  गुलाब  है!!



सुन्दरता की मिसाल बता तुझे क्या  दूँ  !

तिरी खुशबू का नशा छलकता जाम है..


  पीड़ा तन की फिर भी
सहन की जा सकती है
चोट में दर्द से निजात पाना
 कठिन तो होता है पर असंभव नहीं 
 मन में बिंधे शब्द बाण
करते  गहरे  घाव
जरा सी रगड़ से बनते नासूर
जब तब रिसाव उनसे होता
खून के आंसू  नयनों से टपकते
इतना रुलाते हैं कि ..

💠💠

आ० संध्या आर्य जी की रचनाओं के साथ आज की प्रस्तुति समाप्त करती हूँ..पुकार अमिट अनंत

गुनाह
धर्म का ग़लत मतलब निकालना है
इश्क़ आत्मा है
भौतिकता द्वैत के साथ आई है
जन्म और मृत्यु के बीच ख़त्म होगी
क्षणभंगुर जिस्म पर
सामाजिक नाच की समय सीमा ज़िंदगी है..

💠💠
हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए
💠💠
।। इति शम।।

धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍

9 टिप्‍पणियां:


  1. जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर
    तो अवध की गलियों में आ जाना
    और चाहते हो गर मुस्कुराना तो
    दिल -ए-लखनऊ से दिल लगाना।..

    प्रस्तुत के साथ भूमिका और शीर्षक सराहनीय है। परंतु दुर्भाग्य से लखनऊ अब ऐसा नहीं रहा है। सियासी साजिशों की जननी है अपने, प्रदेश की राजधानी ।
    अपराधी भी यहां बमबम कर रहे हैं। यहाँ के एक तेजतर्रार युवा एसएसपी साहब कलानिधि नैथानी जोकि कभी मिर्ज़ापुर के कुशल पुलिस अधीक्षक रहे हैं अपराध नियंत्रण को लेकर पसीना बहाते रहें।
    अपनी मिर्ज़ापुर की माटी पर राजनीत का ककहरा सीखने वाले राजनाथ सिंह यहाँ के सांसद हैं और पिछली मोदी सरकार में केंद्रीय गृह मंत्री के बाद अबकि वे रक्षा मंत्री भी हैं, इसलिए हम मिर्ज़ापुर वाले तनिक सीना चौड़ा किए रहते हैं , भले ही माननीय राजनाथ सिंह ने मिर्ज़ापुर को पुनः मीरजापुर( लक्ष्मी की नगरी) बनाने केलिए कुछ नहीं किया हो ,जब वे मुख्यमंत्री थे तब भी मिर्ज़ापुर तरस रहा था..!
    फिर भी यह सच है कि जब लखनऊ मुस्कुराता है तो पूरे प्रदेश में अमन चैन का वातावरण होता है। काश ! उसका अतीत वर्तमान में परिवर्तित हो जाए...।
    मेरे जैसे गैर साहित्यकारों की रचना यूँ कहे कि अनुभूति को अपनी प्रस्तुति में स्थान देने केलिए आपका हृदय से आभार, धन्यवाद और नमन। मुझे भी नववर्ष पर आज इस प्रतिष्ठित मंच पर आने का अवसर मिला।

    सभी को प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  2. व्वाहहहह
    बेहतरीन आगाज़
    कुंवर नारयण जी की रचना से
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात
    सुन्दर प्रस्तुति |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद |

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर भूमिका लाज़वाब प्रस्तुति पम्मी दी।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर भूमिका के साथ सुंदर प्रस्तुति सुंदर लिंक चयन। सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीया मैम। सभी रचनाएँ उम्दा 👌 सभी को ढेरों शुभकामनाएँ। मेरी पंक्तियों को स्थान देकर मेरा उत्साह बढ़ाने हेतु हार्दिक आभार। सभी को सादर प्रणाम 🙏

    जवाब देंहटाएं

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