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रविवार, 15 दिसंबर 2019

1612...लिहाफ़ ओढ़ूँ,तानूं,खींचूं...

हिमाचल प्रदेश में आजकल ख़ूब बर्फ़बारी हो रही है। 
प्रकृति के नयनाभिराम सौंदर्य को नज़रों में भरने के लिये भारत का प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित प्रदेश सैलानियों को पुकार रहा है। 
शीत ऋतु में पर्यटन के शौक़ीन-मिज़ाज क़ुदरत के चितेरे हिमाचल प्रदेश की पर्यटन यात्रा पर निकल पड़ते हैं। 
बर्फ़बारी के चलते इंटरनेट सप्लाई में बाधा आयी तो 
भाई कुलदीप जी के स्थान पर आज मैं हाज़िर हुआ हूँ आपके समक्ष रविवारीय प्रस्तुति लेकर। 
-रवीन्द्र सिंह यादव 

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ
 

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं
दिले-बर्बाद ये ख़याल रहे
उसने गेसू नहीं सँवारे हैं

लिहाफ़ ओढ़ूँ,तानूं,खींचूं
कानों के छज्जे पर कब्ज़ा
मसों का भनभनाना जारी
चूसते रहते खून कूज़ा-कूज़ा ,

दुःख तो अपनासाथी है( जीवन कीपाठशाला):व्याकुल पथिक 


 
खैर, इन जली हुई रोटियों को थाल में डाली और क्षुधा शांत करने में जुट गया।  तभी मुझे टीवी पर आने वाले धार्मिक धारावाहिक महाकाली  में भगवती का यह कथन, "अंत ही आरम्भ है" का स्मरण हो आया। महामाया की इस ओजस्वी वाणी ने मार्गदर्शन किया और मैं महाभारत काल के एक पात्र एकलव्य के जीवनसंघर्ष पर विचार करने लगा। जिसकी धनुर्विद्या कला से अर्जुन ही नहीं उसके गुरु द्रोणाचार्य भी स्तब्ध थें और उसे अँगूठा विहीन कर दिया था, उसी एकलव्य ने अपने दृढनिश्चय से  तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग कर तीर चलाना सीख लिया। यहीं से धनुर्विद्या के आधुनिक तरीके का जन्म हुआ।

फूल-सी

मुस्कान तुम,

बिखेर अपने होठ पर,
हँसो और सबको हँसाओ,
जिससे सारा जग हो जाये हर्षित।


 
पाखी के अंदेशे पर दर्ज़ हुआ है एहसासनामा,

 बहेलिया का गुनाह क्या है ज़रा देख तो लो,

महफ़ूज़ मुसीबतों से कर रहा परिंदों को,
उदारता के तर्क का माजरा क्या है ज़रा देख तो लो 


आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

14 टिप्‍पणियां:

  1. मैं दार्जिलिंग में रहा हूंँ, इसलिए निश्चित ही बर्फबारी के आनंद और उससे होने वाली कठिनाइयों को समझता हूँ, लेकिन अपने उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों में ठिठुरन के साथ ही गलन का जनजीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में गरीब एवं श्रमिक वर्ग के लिए कंबल एवं अलाव की समुचित व्यवस्था हो, यह सरकार का धर्म - कर्म है।
    पिछले दो दिनों की बरसात ने ठंड को बढ़ा दिया है। ठिठुरन से श्रमिक वर्ग परेशान है।
    रही बात अलाव की तो वह या तो सरकारी कागजों पर जल रहे हैं अथवा फिर कवियों की रचनाओं में.. ?
    जरा घर से बाहर निकल कर हम देखें तो सही किसी चट्टी चौराहे पर नगरपालिका परिषद अथवा प्रशासन ने अलाव जलवाया है क्या या फिर किसी सामाजिक संगठन में यह पुण्य कार्य कर रखा है.. ?
    वैसे तो पूस-माघ का महीना बहुतों को 'महानुभाव' 'प्रख्यात समाजसेवी', 'उदारमना' आदि से अलंकृत होने का महीना होता है । वे सौ रुपए से भी कम का थोक में कम्बल जुटातेे हैं । इसके बाद बड़ा सा जलसा, महोत्सव, सेवा कैम्प आदि लगता है । बड़ा सा मंच शोभायमान होता है । क्लास वन और क्लास टू श्रेणी के लोग बुला लिए जाते हैं तथा फोर्थ श्रेणी का यह कम्बल बांटा जाता है । खूब तालियाँ बजती हैं ।
    सभ्य समाज के ऐसे जेंटलमैनों को क्या कहा जाए.. ?
    पांच लिंक जैसे प्रतिष्ठित ब्लॉग पर मेरी रचना को प्रमुखता देने के लिए आपका हृदय से आभार रवींद्र भाई जी। सभी को प्रणाम।

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  2. बेहतरीन दृश्य...
    अभी चित्र मिला है..
    बढ़िया प्रस्तुति..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. व्वाहहहह
    त्वरित में बनी प्रस्तुति
    काफी से बेहतर है
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  4. बेहतरीन प्रस्तुति ,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  5. रवींद्र जी, बहुत बहुत धन्यवाद मेरी ब्लॉगपोस्ट को शेयर करने के ल‍िए। नींद पर कविता...शैल सिंह, व्याकुल पथिक की हकीकत भरी र‍िपोर्ट,माजरा क्या है ज़रा देख तो लो......अनीता सैनी ,और अपकी बहेलिया का गुनाह क्या है ज़रा देख तो लो, सभी रचनाऐं बेहद खूबसूरती से अपने अहसासों को बयां कर रही हैं।

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  6. बहुत ही प्यारा अंक है रविंद्र जी। जान एलिया जी के बारे में इतना पहली बार जाना। शशि भाई का लेख अपनी तरह का आप है।उस पर सोने जा सुहागा है आज मंच पर उनकी ज्ञानवर्धक टिप्पणी।बहन सुजाता जी की रचना बहुत सुंदर रही। आजके सभी रचनाकारों को मेरी हार्दिक शुभकामनायें। आपको भी बहुत बहुत बधाई इस सुंदर संकलंन के लिए 🙏🙏🙏

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  7. अद्भुत रचनाएं उत्तम प्रस्तुति,सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई।

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  8. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति सर.मेरी रचना को स्थान देने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया. देर से आयी माफ़ी चाहती हूँ.
    सादर

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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