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शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

1484....."कमेंट एप्रूवल" का ऑप्शन लगाने के पहले सोचिये ज़रा

स्नेहिल नमस्कार
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चिट्ठाजगत के सम्मानीय चिट्ठाकारों के लिए संदेश-
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आप हम सभी चिट्ठाकार अपने लेखन के शौक को पूरा करने के लिए इस जगत से जुड़े हैं।
इंटरनेट क्रांति के इस त्वरित प्रतिक्रिया के युग में 
चिट्ठाजगत में लिखे जाने वाले साहित्य पर बेहद धीमी
प्रतिक्रिया और पाठकों की नीरसता से एक उदासी सी छायी रहती है। 
यहाँ उत्कृष्ट साहित्यिक सृजन और साहित्यिक मर्मज्ञ होने के बावजूद
स्थापित चिट्ठाकारों के वर्चस्व को छोड़ दिया जाय तो
बाकी कविताएँ,लेख या अन्य रचनाएँ दो-चार अदद प्रतिक्रियाओं के लिए मुँह बाये रहती है और फिर लेखक निराश होकर 
फेसबुक,इंस्टाग्राम, ट्वीटर जैसे सोशल मंचों की ओर मुड़ने लगते जिसमें लिखकर पोस्ट करते ही 
तुरंत लाईक और प्रतिक्रियाएँ आती है और जिससे  उत्साहित लेखक नये-नये सृजन करते हैं वहींं सक्रिय हो जाते हैं।
आप ही सोचिये
अब ऐसे में किसी चिट्ठाकार के किसी पेज पर कोई पाठक  प्रतिक्रिया लिखे और उसपर लिखा आये कि
"प्रतिक्रिया स्वीकृति के बाद दिखेगी"
मन झुंझलाहट से भर जाता है।
 ऐसा भी क्या लिख देंगे हम? पाठक दुबारा वहाँ कमेंट लिखने मजबूरीवश जायेगा।
चिट्ठाजगत में लेखक और पाठक एक दूसरे का जितना सम्मान करते है वो अन्य सोशल मंचों पर दुर्लभ है।  शालीन और सम्मानजनक प्रतिक्रिया देने वाले हमारे चिट्ठाजगत में "कमेंट अप्रूवल " लगाने का औचित्य समझ नहीं आता।
हाँ,हर जगह अच्छे बुरे विचार के लोग होते है अगर आपको किसी की प्रतिक्रिया नहीं पसंद आ रही तो
आप उसे मिटा सकते हैं या मुँहतोड़ विरोध लिख सकते हैं।
प्रतिक्रिया में कंजूस हमारे चिट्ठाजगत में 
"कमेंट एप्रूवल"
का ऑप्शन लगाने के पहले सोचिये ज़रा।
★

अब आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-


आदरणीया रजनी मल्होत्रा(नैय्यर) जी
स्त्री कितनी आज़ाद

सांसों का स्पंदन
भी फीका और बेस्वाद,
धड़कता है
पर अपना
ही इख़्तियार नही उनपर…
चलते हैं पग
पर रास्ते और मंजिल भी
मेरे द्वारा तय नहीं,
★★★★★
आदरणीय सुबोध सिन्हा जी
दो संस्मरण

सुबह तक  क्या कई दिनों तक उस चुड़ैल की चर्चा ब्लॉक और आस पास के गाँव में होती रही।
ये बात भी पापा को एक सप्ताह बाद पता चल ही गई, मैंने ही बतलाया था अपनी आदतानुसार और ...
मन भर या उस से भी ज्यादा डाँट सुनने को मिली।
तो ....ये थी अन्धविश्वास (?) से जुड़ी मेरे बचपन की जी हुई खुराफ़ाती दो घटनाएँ ....
काश !!! धारा-370 की तरह ये "अंधविश्वास" का भी अंत हो पाता अपने समाज से 
तो हमारी खुशियाँ सौ गुणी हो जाती। 

★★★★
आदरणीय मुकेश सिन्हा जी

बारिश
बूँदें!
हर जगह
चमकती-खनकती
तस्वीर तुम्हारी!
पारदर्शी हो गयी हो क्या?
या 
अपवर्तन के बाद
परावर्तित किरणोंं-सी 
ढल जाती हो
तुम!!

★★★★★★
आदरणीय एम. वर्मा जी
सूरज से टकराया

दो पल के सुकून के लाले
खोले उसने सात ताले,
तिलिस्मी मंजर
मकडी के जाले,
गुंजायमान अट्टहास
कृत्रिम अनुबंध,
रिश्तो की अस्थिया
लोहबानी गंध,
★★★★★

आदरणीय सुधा देवरानी जी
भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता

फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बन जाये कोई कविता
जो मन को लगे सुहानी
फुर उड़ चला ये नील गगन में
लौटा फिर इसी चमन में
पर ना साथ कुछ भी लाया
मैने फिर इसे भगाया
जा ! सागर बड़ा सुहाना
सुन्दर हो कोई मुहाना !
कहीं सीपी मचल रही हो...

★★★★★★★

आदरणीया अनीता सैनी जी
वक़्त का रिसता नासूर

पृथ्वी के परिक्रमण की तरह  कहूँ 
या परिभ्रमण  की तरह उलझी 
नारी चित्त में 
असीम लालसा की ललक 
धड़कनों में धड़कती रहती है |
क्या नारी स्वयंअपनी पीड़ा 
का प्रचंड रुप गढ़ रही है ?
वर्तमान का बदलता परिवेश 
क्या  फिर  इतिहास 
दोहराएगा  ?


★★★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीय विश्वमोहन जी 
सतीसर की सैर

पौराणिक,ऐतिहासिक और भूगर्भीय सभी तथ्य इस विषय पर एकमत हैं कि प्राचीन काल में यह  समूचा प्रदेश जलमग्न था I  नीलमत पुराण के अनुसार ‘का’ अर्थात जल के ‘समीर’अर्थात हवा के द्वारा  ‘शिमिर’ अर्थात रिक्त किये जाने के कारण यह प्रदेश कश्मीर कहलायाI अन्य कारणों में इस नाम का साम्य ‘कश्यप-मेरु’ (कश्यप पर्वत), या ‘कश्यप-मीर’ (कश्यप झील) या ‘कश्यप-मार’ (कछूये की झील) से बिठाया जाता है I प्राकृत भाषा में ‘कास’जलमार्ग का द्योतक है I राजतरंगिणी में ऐसा प्रसंग उल्लिखित है कि इस जलमग्न प्रदेश में‘देवोद्भव’ नामक नाग जाति के  असुर का निवास था I उसके अत्याचार से मुक्ति हेतु मरीची पुत्र कश्यप ने भगवान विष्णु की तपस्या की I विष्णु ने वाराह बनकर असुर का संहार कियाI तदोपरांत वाराह  ने अपने घर्षण से पर्वत को काटकर सारा जल बहा दिया I उस पर्वत को‘वाराह-मुल’ के अपभ्रंश स्वरुप ‘बारामुला’ के नाम से जानते हैं I ऐतिहासिक विचारकों का संकेत इस ओर है कि सेमीटिक जन-जाति की ‘काश’ प्रजाति के लोगों का निवास होने के कारण यह प्रदेश  कश्मीर  कहलाया I भूगर्भीय शोधों पर आधारित  वैज्ञानिक  मत  है  कि करीब दस करोड़ वर्ष पहले यह शीत प्रदेश सैकड़ों फीट गहराई तक जलमग्न था I 
★★★★★

आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया
उत्साहवर्धन करती है।

हमक़दम का विषय है

शर्त

कल का अंक पढ़ना न भूलें कल आ रही हैं विभा दी
अपनी विशेष प्रस्तुति लेकर।

#श्वेता सिन्हा

20 टिप्‍पणियां:

  1. बारिश वृद्ध होने चला है
    यदा-कदा कही कहर भी ढा देता है
    और वहीं हर बार ही ढाता है..
    कारण हम हैं और निवारण भी हमें ही करना है..
    अस्तु..
    बेहतरीन प्रस्तुति..
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  2. भूमिका से पूर्णतया सहमत
    अति सुंदर संकलन

    जवाब देंहटाएं
  3. माननीय श्वेता जी ! आज के अंक में मेरी रचना शामिल करने के लिए हार्दिक साभार आपका ... साथ ही कई मनमोहक रचनाओं को एक ही पटल पर परोसने के लिए धन्यवाद ...
    वैसे आज की भूमिका का एक पक्ष "कमेंट अप्रूवल" तो नहीं ही होना चाहिए ,जब कि "हटा दें" का मौका उपलब्ध है। पर प्रतिक्रियाओं के ना आने पर मेरी सोच कुछ अलग है , हो सकता है गलत हो , पर ....फिर भी ... बस यूँ ही ...

    "तालियाँ जो नहीं बजी महफ़िल में
    तो शक क्यों करता है हुनर पर अपने
    गीली होंगी शायद अभी
    मेंहदी उनकी हथेलियों की ....."

    रचनाओं पर बिना मर्म समझे "वाह्ह्ह्ह्ह्-वाह्ह्ह्ह्ह्" की कतार लगने से तो बेहतर है कि मर्म को छूकर एक दो प्रतिक्रियाएं ही आये।
    उस से भी अलग ये कि रचना पर प्रतिक्रिया ना भी आये और आपकी अंधविश्वास-अंधपरम्परा विरोधी लेखन-सोच से किसी एक की भी मानसिकता मौन ही सही परिवर्तित होती है तो वह उस रचना की सफलता और उचित "प्रतिक्रिया" है।
    वैसे फिर भी प्रतिक्रिया मन को भाना आम मानवीय स्वभाविक गुण है ही।

    (कई दफ़ा तो आपकी रचना लाख अच्छी हो, अगर आप ओहदे पर नहीं हैं या आपकी शक्ल नहीं पसंद तो लोग प्रतिक्रिया देने से कतराते हैं और दूसरी तरफ कोई नामचीन "खाँसता" भी है सोशल मिडिया पर तो लोग "भेंड़-झुण्ड" में "वाह्ह्ह्ह्ह्-वाह्ह्ह्ह्ह्" करते नहीं थकते, ये मन को कचोटता है , पर क्या करना , ये भी एक आम मानवीय गुण ही तो है .... )

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुबोध जी, हर अच्छी चीज की प्रशंसा , चाहे वस्तु हो, गुण हो या रचना, उसे और सवरने-पल्लवित होने में सहायक हो प्रोत्साहित करती है ! जितनी ही उसकी खुशबू फैलेगी, प्रसारित होगी उतना ही उसका मान-सम्मान भी बढ़ेगा। दिल को छूती है बात तभी कोई अपना समय निकाल, भले ही उसके हाथों में मेंहदी लगी हो मुंह से शुभकामनाएं दे अपने उद्गार जरूर प्रगट करता है ! रही बात ओहदे या चेहरे की, तो अधिकांश लोग सिर्फ और सिर्फ रचना पढ़ अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, जो प्रशंसा करते हैं वे सारे ही मुंह देखी बात नहीं करते। दूसरी तरह के लोगों को तो आसानी से पहचाना भी जा सकता है !

      वैसे अपनी निजता को सुरक्षित रखना सब का हक़ है, उसकी मर्जी है, उसमें दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए।

      हटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति,आपने भूमिका में जिस
    विषय का उल्लेख किया,वह महत्वपूर्ण है। कई बार ऐसा मेरे साथ भी हुआ है।
    सभी रचनाएं उत्तम,रचनाकारों को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर अंक। पिछ्ले दस वर्षों में कई प्रयोग किये टिप्पणियों के साथ शुरुआती दौर में उत्साह के साथ हर पोस्ट को पढ़ना और चर्चा मंच में जाकर भी उस पोस्ट की टिप्पणी को लिखना हर चर्चा में 100 से ऊपर टिप्पणियाँ हो जाती थी फिर धीरे धीरे समझ में आ गया हम वही हैं जो यही हैं और रोम की बाँसुरी रोम चली गयी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मन की बात कह दी महाशय आपने ...बिल्कुल सही कहा आपने .....पूर्णरूपेण सहमत ....

      हटाएं
  6. सार्थक भूमिका, सुंदर संकलन और सारगर्भित टिप्पणियों से सजती प्रस्तुति। सुबोध जी की सुबोध सूक्तियाँ मन की बात बनकर निकली।

    जवाब देंहटाएं
  7. अंक बहुत सुन्दर सदैव की तरह.. सभी रचनाएँ बेहद सुन्दर .., श्वेता जी कि भूमिका अच्छी लगी । बाकी सोच तो सब की अपनी स्वयं की है मानना या मानना व्यक्तिगत निर्णय है ।

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत ही सुंदर सत्य भूमिका के साथ.....एक सुंदर व सार्थक चर्चा......
    आभार।

    जवाब देंहटाएं
  9. भूमिका शानदार !!श्वेता ,बहुत सुंदर प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  10. विचारणीय भूमिका के साथ सुंदर लिंकों का चयन।

    जवाब देंहटाएं
  11. चिट्ठाजगत में लेखक और पाठक एक दूसरे का जितना सम्मान करते है वो अन्य सोशल मंचों पर दुर्लभ है। शालीन और सम्मानजनक प्रतिक्रिया देने वाले हमारे चिट्ठाजगत में "कमेंट अप्रूवल " लगाने का औचित्य समझ नहीं आता।
    सटीक सुन्दर भूमिका के साथ लाजवाब प्रस्तुतिकरण
    उम्दा लिंक संकलन....
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार।

    जवाब देंहटाएं
  12. वाह।बेहद सुंदर प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  13. बेहतरीन संकलन प्रिय श्वेता दी
    सभी रचनाएँ बहुत ही सुन्दर, मुझे स्थान देने के लिए तहे दिल से आभार आप का
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  14. कमेंट अप्रूवल पर आपके विचार बिल्कुल हमारी ही सोच के मुताबिक है ।
    वैचारिक भुमिका के साथ सुंदर लिंको का संकल्न
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  15. "भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता"
    एवं
    "स्त्री कितनी आज़ाद"

    इन दो रचनाओं का कोई जवाब नहीं। एक संस्कार भरती रचना...और एक रचनाकार के लिए रचना।
    अद्भुत! अप्रतिम! अद्वितीय एवं सराहनीय रचना।

    जवाब देंहटाएं
  16. भूमिका में एक पक्ष रख जो सलाह दी गयी है उसकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप, ''अनदेखे अपनों'' में आपसी भाईचारे, स्नेह, मैत्री के साथ-साथ, एक दूसरे को जानने-समझने, विचार-विमर्श में भी और बढ़ोत्तरी होगी ! ऐसे कदम के लिए साधुवाद !

    जवाब देंहटाएं

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