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शनिवार, 10 नवंबर 2018

1212... निराशा



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सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

यम से पंगा-दंगा-चंगा सब हो गया
अब समय आ गया सूर्य से गुहार लगाने की
यानी कल से छठ शुरू हो रहा है
पूरे देश में बिहारी फैल चुके हैं अत:
छठ पर्व से सभी परिचित होंगे
पूरे विधि-विधान छत्तीस घंटे का उपवास
सभी को कष्ट से ज्यादा
परेशान करता है डर/भय
परन्तु जीतता नहीं
निराशा

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पूरी कालोनी, कालोनी
जगमगाने से पहले ही खुश हो जाती है
उजाला होना तो दूसरा चरण है
बाद का चरण है
बिजली आने के बाद का
बत्ती के जल जाने से पहले का,

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आशा-निराशा
सुख के कुछ फूल चुनने लगती हूँ…
प्रयास करती हूँ, विफल हो जाते हैं,
सहम जाती हूँ,
विफलता के अन्धकार के उस पार,
रोशनी की किरण ढूँढने लगती हूँ…

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आशा और निराशा
गिर-गिर फिर उठते चले
अब आज उस अतुल श्रम का प्रतिफल
हमने ये पाया है
कि खुद उस व्योम का स्वर्ग इस धरा पर
हमारे लिए उतर आया है

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निराशा के नाम
मेरी मुहब्बत बेकार है...
बीते कल के खाने की तरह॥
मेहमान जो आते हैं कभी,
तो लौट के जाने की तरह...
मगर मैं जानता हूँ,

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मुक्तक संग्रह
चरागों ने धुआँ छोड़ा बहुत पर रौशनी कम दी,
घटा छायी जो चंदा पर तो उसने चाँदनी कम दी,
न देखो तुम मेरी मजबूरियों की वजह भी कुछ है,
जहाँ की फिक्र तो दे दी, खुदा ने आमदनी कम दी।

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फिर मिलेंगे...
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8 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय दीदी..
    सादर चरणस्पर्श..
    पर्व की शुभकामनाएँ
    जानदार प्रस्तुति...
    सादर...

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  2. सुंदर प्रस्तुति शानदार रचनाएं

    जवाब देंहटाएं
  3. हमेशा की तरह बहुत ही लाज़वाब प्रस्तुति है दी।
    सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक हैं।
    एक प्रेरणादायक अंक.पढ़वाने के लिए आभार दी।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  5. शानदार प्रस्तुति मेहनती और अन्वेषण दृष्टि दी आपकी।
    सभी रचनाऐं बहुत सुंदर रचनाकारों को बधाई ।

    जवाब देंहटाएं

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