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मंगलवार, 18 सितंबर 2018

1159...वैसे तो फेसबुक पर जो भी चाहे एक खाता खुलवा सकता है

बदलाव प्रकृति का नियम है। बिना बदलाव के जागृति संभव नहीं। समय ही तय करता है बदलाव सकारात्मक है कि नकारात्मक। 
साहित्य जगत में भी बदलाव की सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है। देश की समसामयिक समस्याओं पर अपनी पैनी नज़र रखने वाले हमारे बुद्धिजीवी रचनाकार गंभीर सृजनशीलता में जुटे है।
सृजनशीलता कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकती,
फर्क पड़ता है हमारे दृष्टिकोण से।
मतदाता का पक्ष होता है, 
वो किसी व्यक्ति को अपना मत देता है। 
लेकिन लेखक को निष्पक्ष होकर 
विषय पर ही लिखना चाहिए, 
व्यक्ति पर नहीं....

सादर अभिवादन....
आदरणीय भाई कुलदीप जी का संदेशा सुबह से ही आ गया
समय है...प्रस्तुति बन जाएगी समय से पहले...
आज एक नयापन...अगले सप्ताह का विषय पहले
यानि की प्रस्तुति नीचे से शुरु.....

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हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का सैंतीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'तृष्णा'
...उदाहरण...
निर्णय-अनिर्णय के दोराहे पर डोलता जीवन,
क्या कुछ पा लूँ, किसी और के बदले में,
क्यूँ खो दूँ कुछ भी, उन अनिश्चितता के बदले में,
भ्रम की इस किश्ती में बस डोलता है जीवन।
-पुरुषोत्तम सिन्हा

फिल्म नयादिन नई रात
संजीवकुमार-जया भादुड़ी
उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
एक खास बात और आप इस शब्द पर फिल्मी गीत भी दे सकते हैं

अंतिम तिथिः शनिवार 22 सितम्बर 2018  
प्रकाशन तिथि 24 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 

सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
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अब आपको ले चलते हैं रचनाओं की ओर....
"कब तक”.......मीना भारद्वाज
नैन हमारे तकते राहें ,जाने तुम आओगे कब तक । 
जाओ तुम से बात करें क्यों , साथ हमारा दोगे कब तक ।। 

ना फरमानी फितरत पर हम , बोलो क्योंकर गौर करेंगे । 
तुम ही कह दो जो कहना है , हम से और लड़ोगे कब तक ।।

संध्या वंदन...नूपुर

सांझ की लौटती धूप
धीरे-धीरे आती है,
सोच में डूबी हौले-हौले 
भोले बच्चों जैसी
फूल-पत्तियों को..
सरल सलोने स्वप्नों को
दुलारती है ।
हल्की-सी बयार से
पीठ थपथपाती है ।

बह जाते हैं नीर....पुरुषोत्तम सिन्हा

असह्य हुई, जब भी पीड़,
बंध तोड़ दे, जब मन का धीर,
नैनों से बह जाते हैं नीर,
बिन बोले, सब कुछ कह जाते हैं नीर...

मौसम बदलने लगा.....नीना पॉल

मिले हादसे मुझको हर मोड़ पर
सम्भलने से पहले फिसलने लगा

तेरी याद में खो गया इस क़दर
उम्मीदों का इक दीप जलने लगा

मिलने से पहले जुदाइयों का ग़म
पल-पल दिलों में ही पलने लगा

फिज़ूल टाईम्स.......डॉ. राजीव जोशी
मेरी आँखों ने ऐसे मंजर देखे हैं
भीख माँगते छोटे कोमल कर देखे हैं।

खून पसीने से तन उनके तर देखे हैं।
हवादार बिन दीवारों के घर देखे हैं



पिता सुधा स्रोत....कुसुम कोठरी
देकर मुझ को छांव घनेरी
कहां गये तुम हे तरुवर
अब छांव कहां से पाऊं

देकर मुझको शीतल नीर
कहां गये हे नीर सरोवर
अब अमृत कहां से पाऊं ।


शीर्षक कथा
उलूक उवाच....डॉ. सुशील जोशी

लिखने लिखाने के 
विषयों पर क्या 
कहा जा सकता है 
कुछ भी कभी भी 
खाली दिमाग को 
फ्यूज होते बल्ब के 
जैसे चमका सकता है 
कभी घर की एक 
बात उठ सकती हैं 
कभी पड़ोसी का 
पड़ोसी से पंगा 
एक मसालेदार 
मीनू बना सकता है 

इज़ाज़त दें 
दिग्विजय 





20 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    एक खासियत है आपमें
    आफत मे सक्रियता
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रभावशाली प्रस्तावना...., बहुत उम्दा प्रस्तुति । मेरी रचना को संकलन में मान देने हेतु तहेदिल से आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात
    अच्छी रचनाये प्रस्तुतीकरण भी शानदार हूं।आभार

    जवाब देंहटाएं
  4. एक लेखक बदलाव का भी बदलाव चाहता है क्यूंकि वो हर वक्त बेहतर से बेहतर करना चाहता है.
    इस के लिए वो अपने आप को हमेशा अपडेटेड रखता है. ताकि हर परिस्थिति का आलोचनात्मक परीक्षण कर सके.

    बेहतरीन हलचल.

    जवाब देंहटाएं
  5. सुप्रभातम् आदरणीय सर,
    बेहतरीन विचारणीय भूमिका के साथ बहुत अच्छी रचनाओं का संगम है आज के अंक में।
    सुंदर प्रस्तुति और हमक़दम के लिए नवीन रोचक विषय..वाहह।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर समसामायिक कविताओं के बीच 'उलूक'की एक बासी बकवास भी ले आये आप। सुन्दर हलचल प्र्स्तुति के बीच जगह देने के लिये आभार दिग्विजय जी।

    जवाब देंहटाएं
  7. सृजनशीलता कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकती,
    फर्क पड़ता है हमारे दृष्टिकोण से।... अक्षरशः सत्य। सृजन स्वयं ही पीड़ा लेकर सुख उत्पन्न करती है। ...
    मेरी रचना को संकलन में मान देने हेतु तहेदिल से आभार

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत ही खूबसूरत प्रस्तावना के साथ लिंकों का संयोजन।
    आभार।
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवम् धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  9. कविता का बड़प्पन
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    "कविता का यह एक लक्षण है कि हर कवि अपने आप को बड़ा कवि मानता है । मैं भी अपवाद नहीं हूँ । दरअसल यह कविता के ही बड़प्पन की बात है । मैं कविता को सबसे बड़ी विधा इसलिए मानता हूँ कि वह लिखने वाले को अपने-आप बड़ा बना देती है ।"

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    - भालचंद्र नेमाड़े
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    श्री सुधीर ओखदे ने यह विचार साझा किया ।
    अच्छा लगा ।
    आप सबसे साझा करने का मन हुआ ।

    जवाब देंहटाएं
  10. सुंदर संकलन और प्रस्तुति ।
    हलचल लाने वाले सभी रचनाकारों को..दिग्विजयजी को बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  11. सुंदर प्रस्तुति और रोचक विषय

    जवाब देंहटाएं
  12. आदरणीय दिग्विजय जी -- सुंदर गीत के साथ आज के सुंदर , सराहनीय संकलन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाये |उलूक दर्शन और एक अन्य पोस्ट पर लिखना संभव ना हो क्षमा प्रार्थी हूँ - पर सब रचनाकारों को मेरी हार्दिक शुभकामनायें | हमकदम का नया विषय रोचक है | सादर --

    जवाब देंहटाएं
  13. बहुत सुन्दर लिंक संकलन लाजवाब प्रस्तुतिकरण...

    जवाब देंहटाएं
  14. सुंदर और स्तरीय रचनाओं के बीच फ़िज़ूल टाइम्स जी फ़िज़ूल हरकत को भी स्थान देने के लिए धन्यवाद।
    आपके प्रति कृतकृत्य हूँ!
    पुनः आभार।

    जवाब देंहटाएं

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