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रविवार, 25 सितंबर 2016

436.....लोग सब जुट जाऐंगे

  सुप्रभात 
सादर प्रणाम 
रविवारीय चर्चा मे 
आज सीधे चलते है लिंको की 
ओर




ग्राम छोटा सा 
जीवंत लोग वहां 
मस्ती में जीते |

चौपाल पर 
शाम ढले आजाते 
भजन गाते |


     "डोर"
तेरे से बंधी मन की डोर
कई बार मुझे
तेरी ओर खींचती है

जी चाहता है
तेरी गलियों के फेरे लगाऊँ
जाने-पहचाने चेहरे देख मुस्कराऊँ




         ग़ज़ल "लोग जब जुट जायेंगे तो काफिला हो जायेगा"
लोग जब जुट जायेंगे, तो काफिला हो जायेगा
आम देगा तब मज़ा, जब पिलपिला हो जायेगा

पास में आकर कभी, कुछ वार्ता तो कीजिए
बात करने से रफू शिकवा-गिला हो जायेगा



कुछ फोड़
कुछ मतलब 
कुछ भी 
फोड़ने में 
कुछ लगता 
भी नहीं है 
नफे नुकसान 
का कुछ 
फोड़ लेने 
के बाद 
किसी ने 
कुछ सोचना 
भी नहीं है 
फोड़ना कहीं 
जोड़ा और 
घटाया हुआ 
दिखता भी 
नहीं है



शहीदों को जिगर में अपने जगाकर तो देखो
कहानी उनकी, उनको सुनाकर तो देखो

सुना दो उनको अमर उन्हीं की कहानी
कहानी जो आँखों में लाती है पानी
पानी नहीं है ये है आँसू की धारा
स्मृति की झिरती हो जैसे अमृत की धारा
रोती है माता और रोती है बहना

••●●♤♡♢♧●●●●●●●■•

अब दिजिए 
विरम सिंह सुरावा 
को आज्ञा 
धन्यवाद

9 टिप्‍पणियां:

  1. आप की चुनने की आदत बहुत सशक्त है |बहुत सुन्दर पसंद आपकी :
    मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार |

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  2. सुन्दर रविवारीय अंक हलचल का । आभार विरम जी 'उलूक' के सूत्र 'तू भी कुछ फोड़ना सीख ‘उलूक’ ....' को जगह देने के लिये ।

    जवाब देंहटाएं
  3. "पाँच लिंकों का आनन्द" में मेरी रचना शामिल करने के लिए हार्दिक आभार!! संकलन में शामिल अन्य रचनाएँ बेहद पसन्द आईं ।

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  4. हम लोग बचपन में गिट्टी फोड़ खेलते थे, हमारे नेता किस्मत फोड़ खेलते हैं और हमारा उलूक विचार फोड़ खेलता है.

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  5. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. सबने लिखा
    मैने पढ़ा
    चयन के मामले में
    मंजते जा रहे हैं विरम जी
    जितना पढ़ेंगे..उतना ही अछा लिखेंगे भी
    सादर

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