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सोमवार, 19 सितंबर 2016

430...देखा कुछ ? मेरे देखे को देख कर क्या करोगे

सादर अभिवादन

शारदीय नवरात्रि 
के लिए ग्यारह दिन
की प्रतीक्षा और


और आज ..चुनिन्दा रचनाएँ आपकी प्रतीक्षा मे...


ओ म्हाने बालपने मे मत दे देजो रे माँ 
पढाई करवा म्हें जास्याँ
ओ माँ पढाई करवा म्हें जास्याँ 


यथासाध्य विधि पूर्वक पूजता है। उसकी आस्था व मान्यता होती है कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं।
इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता। उसे ऐसा  लगता है जैसे उसके घर का कोई प्रिय सदस्य दूर जा रहा हो। उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है। नदी, तालाब, सागर में उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है।



ताना बाना..............रेवा
कुछ प्रश्न हैं जो
मन को बार बार
परेशां करते हैं ......
कागज़ कलम उठाती  हूँ




तुम्हारे कंठ में 
चिरकाल से बसी
इस घुटी हुई सिसकी के
आवेग की तीव्रता से
स्तब्ध हूँ मैं ! 


आसान नहीं होता.......इन्दु रवि सिंह
मर जाना सबसे आसान है
लोग कहते हैं
लेकिन  
मरने की
चाह रखना
भले आसान हो




पूछा तो कभी होता 
दिल से जो मेरे ये, 
किस के लिए रोता ? 

सोने भी नहीं देतीं 
यादें अब तेरी 
रोने भी नहीं देतीं 

आज का शीर्षक..

सब लोग एक साथ 
एक ही चीज को 
एक ही नजरिये 
से क्यों देखें 
बिल्कुल मत देखो 
सबसे अच्छा 
अपनी अपनी आँख 
अपना अपना देखना 
....
दें इज़ाज़त यशोदा को
और देखिये ये वीडिओ
जो रोमांचक भी है
और ललचाता भी है.. काश हम भी ड्राईव्ह कर पाते


Driving On The Atlantic Ocean Road In Norway




4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह सुन्दर वीडियो के साथ आज हलचल ले कर आयी हैं यशोदा जी । आभारी है 'उलूक' देख कर अपने एक पुराने कबाड़ 'देखा कुछ' को देख कर।

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  2. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!

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  3. बहुत ही सुन्दर सूत्र संकलन ! आज की हलचल में मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए आपका ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद यशोदा जी !

    जवाब देंहटाएं

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