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बुधवार, 14 सितंबर 2016

425....औरों के जैसे देख कर आँख बंद करना नहीं सीखेगा किसी दिन जरूर पछतायेगा

सादर अभिवादन
आज हिन्दी दिवस है
मनाया बिलकुल वैसे ही जाएगा
जैसे गाँधी जयन्ती मनाई जाती है
कोई क्या और कैसे करे
इसकी चिन्ता उन पर ही छोड़ दीजिए
पर हम तो हम ही हैं
हिन्दी को छोड़ें तो छोड़ें कैसे
हमको तो जकड़े गए हैं
हिन्दी की गिरफ्त में...
ओह..
फिर से लिखने लगी मैं...

चलिए आज की चयनित रचनाओं की ओर..


क्या शब्द था - दिव्य !!! 
जैसे प्रसन्न आकाश , मुक्त,भव्य ,असीम . 
कितना सार्थक दीप्त त्रुटिहीन . 
अर्थ का अनर्थ , 
घोर अपकर्ष 
कैसी मनमानी वंचना शब्दों से , 
कर डाला 

उलझनों की अति हो गई
बोझ मन का कैसे हल्का हो
कहने को शब्द नहीं मिलते
मुंह तक आते आते ही
बेआवाज होते जाते हैं


तुम ग्रामीण अनपढ़ असभ्य हो
प्रज्ञा शील अनुशासन का भान नहीं है
तेरी दो रुपये की मूली पंद्रह में बेचते हैं
हम नसीब वाले तुम पर प्रभु का ध्यान नहीं है

क्या तुम नही जानते कि,
प्यार में कोई शर्त नही होती....
पर तुमने हर मोड़ पर शर्त रखी,
कि जैसे ये रिश्ता सिर्फ मेरा हो..

इसको खिलोना समझ—
खरीदा भी नहीं था—
छीना भी नहीं था,किसी और से
यह एक बहाना भी नहीं था—
खुद से-किसी और से भी नहीं
मेरे वज़ूद से कतरा-कतरा होते रहे

सपने   यहाँ   कभी  बुन 
सुन आज प्यार की धुन 
मनमीत     पास    तेरा 
मत  छोड़  साथ    मेरा  

हो सके , ऐतबार कर लेना। 
और तुम मुझसे प्यार कर लेना।

पहले वादा करो मुहब्बत का ,
फिर गिले तुम हज़ार कर लेना।

आज का शीर्षक....

चोरों की रपट 
और गवाही पर 
अंदर भी कर 
दिया जायेगा 
सोच कर लिखेगा
समझ कर लिखेगा 
वाह वाह भी होगी 
कभी चोरों का 
सरदार इनामी 
टोपी भी पहनायेगा । 
........................................

आज बस करते-करते आठ रचनाएँ चुन डाली
पता नहीं लोगों के पास समय होगा कि नहीं पढ़ने का
आज्ञा दें,,
सादर


6 टिप्‍पणियां:

  1. आपका आभार यशोदा जी ,एक बैठक में पढ़ लेना बहुत अच्छा लगता है .

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    सादर प्रणाम
    हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई
    सुन्दर लिंक का चयन
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर बुधवारीय हलचल । आभारी है 'उलूक' एक पुरानी बकवास 'औरों के जैसे देख कर आँख बंद करना नहीं सीखेगा किसी दिन जरूर पछतायेगा' को शीर्षक देने के लिये ।

    जवाब देंहटाएं
  4. शानदार पांच लिंकों का खजाना में आज आठ पढ़ने को मिलीं |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार यशोदा जी |

    जवाब देंहटाएं
  5. हिन्दी दिवस -
    सूर की राधा दुखी, तुलसी की सीता रो रही है।
    शोर डिस्को का मचा है, किन्तु मीरा सो रही है।
    सभ्यता पश्चिम की, विष के बीज कैसे बो रही है ,
    आज अपने देश में, हिन्दी प्रतिष्ठा खो रही है।।
    हाय! माँ, अपने ही बेटों में, अपरिचित हो रही है।
    बोझ इस अपमान का, किस शाप से वह ढो रही है?
    सिर्फ़ इंग्लिश के सहारे भाग्य बनता है यहाँ,
    देश तो आज़ाद है, फिर क्यूं ग़ुलामी हो रही है?
    हिंदी पखवाड़ा -
    आज माँ की दुर्दशा पर, पुत्र अविरल रोएगा,
    उसके अधिकारों की खातिर, चैन अपना खोएगा.
    बोझ हिंदी भक्त का, पन्द्रह दिनों तक ढोएगा,
    फिर मदर इंग्लिश के, चरणों में पड़ा, वह सोएगा.

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति। .
    हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई!

    जवाब देंहटाएं

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