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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

410....राजनीतिक दलों की फंडिंग , चन्दे का मायाजाल और सूचना के अधिकार का प्राविधान /


जय मां हाटेशवरी...

काफी समय बाद...
दिल्ली से आते हुए...
चंडीगढ़ भी रुका...
कई पुराने मित्रों से भेंट हुई...
बहुत आनंद आया...
कॉलिज की पुरानी यादें ताजा हो आयी...
मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली समझता हूं...
मुझे जीवन में अच्छे ही इनसान मिले...
पर एक या दो बुरे लोगों से सामना भी  हुआ...
वो इतने बुरे थे कि...
वो इनसान नहीं हो सकते...
उनके बारे में कभी अवश्य चर्चा करूंगा...
पर अभी समय है...आज की चर्चा का...

अपनों से मिला है न ज़माने से मिला है
जलने का तज़ुर्बा भी बड़ी चीज़ है यारों
मुझको हवन में हाथ जलाने से मिला है
किसको फ़िकर है दर्द की, सब पूछते हैं ये
किसकी गली से किसके ठिकाने से मिला है
रिसता न गर लहू तो कोई जान न पाता
क्या ज़ख्म लिए कौन ज़माने से मिला है

राजनीतिक दलों की फंडिंग , चन्दे का मायाजाल और सूचना के अधिकार का प्राविधान / विजय शंकर सिंह
2013 में मुख्य सूचना आयुक्त , भारत सरकार ( सीआईसी ) ने एक निर्णय दिया कि, सभी राजनीतिक दल पब्लिक अथॉरटी हैं और इस कारण वे, सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांगी गयी सूचना देने के लिये बाध्य हैं । सीआईसी ने सभी राजनितिक दलों को, इस अधिनियम के अंतर्गत सुचना अधिकारी और उनके आदेशों पर अपील की सुनवाई के लिए अपीलीय अधिकारी की नियुक्ति करने की बात कही । आरटीआई अधिनियम की धारा 20 ( h ) के अंतर्गत पब्लिक अथॉरटी हर उस गैर सरकारी संगठन को माना गया है जिसे सरकार कोई न कोई सहायता देती है । सरकार भी जो धन देती है वह अंततः जनता का ही धन होता है जो उसे करों के रूप में मिलता है । इस पर सभी राजनीतिक दल एकजुट हो गए और उन्होंने सीआईसी के इस प्राविधान का विरोध किया । अब यह मामला अदालत में है ।
राजनीति में शुचिता की बात सभी करेंगे, पर जब ठोस कार्यवाही की बात आएगी तो सभी बगलें झाँकने लगेंगे । हर राजनीतिक दल पर, जब जिसका भविष्य थोडा सा भी अच्छा दिखने लगता है तो कुछ  प्रत्याशी खुद ही थैली ले ले कर दौड़ने लगते हैं । राजनीतिक दल भी यह अवसर भी चूकना नहीं चाहते । इस से उस छोटे से वर्ग में जो राजनीति में शुचिता को खोजते हुये देशहित और समाज सेवा के लिए आगे आने लगता है को यह थैली दौड़ निराश और कुंठित करती है । बहुत से अच्छे और विद्वान तथा योग्य लोगों को जिन्हें सच में संसद या विधान सभा में होना चाहिए के मुंह से मैंने स्वयं सुना है कि, अब चुनाव उनके बस का नहीं रहा । इसी धन के लालच के कारण राज्य सभा और विधान परिषदें जो उन लोगों को सदन में लाने के लिए बनायी गयी थीं, जो अपने अपने क्षेत्र में योग्य तो हैं पर किन्ही कारणों से प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ सकते हैं को यहाँ ला कर उनकी मेधा तथा प्रतिभा का लाभ उठाया जा सके, को दरकिनार कर पूँजीपतियों को केवल धन के बल पर सदन में लाया जा रहा है । यह लोकतंत्र के कैचमेंट एरिया का संकुचन है । धीरे धीरे जनता की प्रतिभागिता, कुछ ख़ास वर्ग से सिमटते सिमटते , कुछ ख़ास परिवारों तक सिमटने लगी है । इसे आप लोकतंत्र की विडंबना भी कह सकते हैं ।






















क्या आँच दे सकेंगे बुझते हुए शरारे
गोया के आ रहे हैं अब तक सँभालते ही
पागल नदी को फिर भी दिखते नहीं किनारे
डालो अलाव में जी! कुछ और अब जलावन
क्या आँच दे सकेंगे बुझते हुए शरारे
तुर्रा है यह के उल्फ़त ख़ंजर की धार सी है
और उसपे रक्स को हैं बेताब लोग सारे
वह बेल इश्क़ वाली सरसब्ज़ क्या रहेगी
ग़ाफ़िल रहेे जो तेरे शाने के ही सहारे












सिर्फ एक दो ईंटों से ही
सिर्फ एक दो ईंटों से ही
कोई मकान नहीं बनता
सिर्फ नारों -इश्तिहारों से
कभी हिंदुस्तान नहीं बनता -
बूंद बूंद से सरिता बनती
सरिता सरिता से सागर है
धागों से धागे न जुडते
कोई परिधान नहीं बनता -










उम्मीदों की सलीब
एक बोझिल सुबह
जिसमें समेटना है दिन का विस्तार
इसके पहले कि मायूसियाँ
शाम के साथ
लिपटने लगे पहलू के साथ
धन्यवाद।



















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