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शनिवार, 30 जुलाई 2016

379 .... बारिश







सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

जुलाई खत्म ..... सावन गुजर रहा हो
और 
हरियाली छाई नहीं पोस्ट में
व्यर्थ मेहनत होगी न




गई बिजली , बरसात भी बस आने को है।
बरसता पानी अब मल्हार छेड़ जाने को है।

छत पर टपकेंगी बूँदे ,रात भर रुक कर
कोई है जो  आमादा कुछ सुनाने को है।

याद आएगी अपने साथ कई याद लिए
इक घनेरी - सी घटा टूटकर छाने को है।














तुम आसमान में घूमते फिरते
पर मेरे पास क्यों नहीं आते ?
तुम यहाँ आ कर देखो
कि ये बूँदें कितनी सुन्दर हैं ।
क्या मजा है आसमान में
तुम भी मन में करो विचार ।














पत्तों के चादर ओढ़े
सिमटे पर अपने आप में
सैकड़ों पंक्षियों के जोड़े
जो सिकुड़े एक दूसरे से लिपटे
दुबके हैं, समेटे
निःशब्द अपनी प्यास मिटाने
नम हो जाने और नये जीवन को
अपनी छाँव में अँकुरित कर
मोहब्बत को सज़ाने में मशग़ूल








डालियों में होती है बेचैनी
शायद चीर कर टहनियों के बाजुओं को
कोई निकालना चाहता है बाहर
एक नए सृजन के लिए।











फिर मिलेंगे .... तब  तक के लिए
आखरी सलाम




विभा रानी श्रीवास्तव




4 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    दीदी के नंमन
    अच्छी रचनाएँ चुना आपने
    और सटीक भी
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    सादर प्रणाम
    सुन्दर हलचल
    प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर बारिश की फुहार लिए सुन्दर हलचल प्रस्तुति ...

    जवाब देंहटाएं

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