निवेदन।


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गुरुवार, 25 जुलाई 2024

4197...लीपपोतकर लीक-वीक, ये लोकलाज भी लील गए...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पाँच पसंदीदा रचनाओं के साथ हाज़िर हूँ-

धंधेबाज़ फिर धंधे पर!

लीपपोतकर लीक-वीक,

ये लोकलाज भी लील गए।

इंसाफ़ के अंधे बुत के,

कल-पुर्ज़े सारे हिल गए।

बूढ़ा होता अखबारवाला और घटती छोटी बचत

देश की अर्थव्यवस्था बदली

उसे पता चला विज्ञापनों से

जबकि उसकी अर्थव्यवस्था

थोड़ी संकुचित ही हुई इस दौरान

घटते अखबार पढ़ने वालों के साथ।

*****

आप जेल में क्यों रहते हैं- रूमी

रात मेंआपका प्रिय भटकता है।

सांत्वना स्वीकार नहीं करते।

तुम  विलाप करते हैं, "उसने मुझे छोड़ दिया।" "उसने मुझे छोड़ दिया।"

बीस और आएंगे।

*****

बड़े धोखे हैं इस राह में...IAS, IPS बनने के लिए ऐसे उड़ाते हैं आरक्षण के न‍ियमों की धज्ज‍ियां

मान लीजिए मेरे पिता IAS ऑफिसर हैं, दो साल में रिटायर होने वाले हैं। मैं ओबीसी में हूं। लेकिन मेरे पिता क्लास-1 जॉब में हैं तो मुझे आरक्षण नहीं मिलेगा। उन्होंने खूब पैसा कमा लिया है। इतना कि जीवनभर काम चल जाएगा। कई बिल्डिंग्स खरीद ली हैं, किराया हर महीने लाखों में आता है। मुझे आईएएस बनना है। मैंने पापा से कहा कि जेनरल से नहीं बन पाऊंगा, ओबीसी से बनना है, आप सपोर्ट करो। आप रिजाइन कर दो। उन्होंने रिजाइन कर दिया। अब मुझपर ये सीमा लागू नहीं होती कि मेरे पिता ग्रुप 1 जॉब में हैं।

*****

लोकप्रियता की धमक

हम लोग विशाल और रेखा भारद्वाज का शो 'ओ साथी रे' देखने गए थे। बरसात के मौसम में हम तो समय से पहुंच गए लेकिन मुख्य कलाकार देर से पहुंचे। जब हम अंदर बैठे तो मंच खुला हुआ था। साज़ रखे थे, साज़िंदे आ जा रहे थे। वे तब तक आते जाते रहे जब तक उद्घोषक ने आकर माफी मांगते हुए विशाल और रेखा को मंच पर आमंत्रित नहीं कर लिया।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


बुधवार, 24 जुलाई 2024

4196..पड़ रही फुही झीसी झिन–झिन..

।।प्रातःवंदन।।

"सावन का हरित प्रभात रहा

अम्बर पर थी घनघोर घटा।

फहरा कर पंख थिरकते थे

मन हरती थी वन–मोर–छटा॥

पड़ रही फुही झीसी झिन–झिन

पर्वत की हरी वनाली पर।

'पी कहाँ' पपीहा बोल रहा

तरु–तरु की डाली–डाली पर॥"

 श्याम नारायण पांडेय

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण और चंद वैचारिक शब्लिशब्द कोश लिए हम..✍️

बड़े बेआबरू होकर ......!

            बुक शेल्फ से किताबें उठा उठा कर जमीन पर पटकी जा रही थी। कबाड़ियों को क्या सब धान बाइस पसेरी लेना है। घर वाले भी इस रद्दी से मुक्ति पाएंगे और सेल्फ उनके शो पीस रखने के काम आएगी या फिर क्रॉकरी।..

✨️

खजूर: बिस्कुट जैसा एक व्यंजन

खजूर तले जा रहे हैं

 

     खजूर एक फल होता है— यह सभी जानते हैं, लेकिन कुरकुरे, हल्के मीठे, तले हुए बिस्कुट-जैसे एक व्यंजन का नाम भी “खजूर” होता है— यह बहुतों को शायद नहीं पता होगा।

हम लोग जब छठी कक्षा में हाई स्कूल गये, तब हमने इसके..

✨️

माँ तुम अक्सर याद आती हो 

होती हूँ जब-जब निराशा के गर्त में 

तुम आ कर सहला जाती हो 

कौन आस-पास घूमा करता है 

दुआएँ तुम्हारी मेरा माथा चूमा करती हैं 

✨️

छुने से अल्फाजों को मेरे पंख लग गये अर्ध चाँद नयनों को तेरे l

लहरें दीवानी कहानी रचने लगी घटाओं की जज्बाती तरंगों पे ll

साँझ गुलाबी रिमझिम सिंदूरी बारिश खत लिखे बादलों कागज ने l

काजल गलियाँ आईना वो रंजिशें रक्स साँझा हो गयी फिर चाँद से ll

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️


मंगलवार, 23 जुलाई 2024

4195...जीवन के सभी मौसम..

 मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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कर्मकांड को कर्म कहने वाले हम

धार्मिक होना अध्यात्मिक होना कहने वाले हम

धर्म को प्रतिष्ठित करने में 

मानवता को सहजता से अनदेखा करने वाले हम

कब साम्प्रदायिक हुए पता न चला

क्या इतने मासूम हैं हम?

धर्म का परचम लिए रटे-रटाये

नारों को दुहराते हुए

उन्माद में बौराए हुए हम

शिक्षित होकर भी

सूचनाओं के आधार पर

ज्ञान अपडेट करने वाले हम

भ्रमित ,मूढ़,अतार्किक ,जिसे

आसानी से बरगलाया जा सकता है

अंधकारमय भविष्य से अंजान

न जाने किस नशे में चूर है हम...?



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आज की रचनाएँ-

असुर

मुझे आगे की यात्रा पर जाना है
कर रही हूँ आह्वान पुन:-पुन:
हे असुरों आओ
जा न सकूँगी आगे 
तुम्हारी इन अमानतों सहित
ले लो वापिस ये नख,ये तीक्ष्ण दन्त
ये आर - पार चीरती कटार
मुक्त करो इस दानवता से
पर नदारद हैं असुर
 !



बधिया


आवश्यक यह भी है कि 
वह जो नहीं बोलते हैं 
देश वह भी बोले 

यह तो और भी आवश्यक है कि 
वह जब बोलने नहीं कहें 
तब कोई कुछ भी नहीं बोले 
सब रहे चुप, एकदम चुप 


तना हुआ वृक्ष


मैं भी

नारियल का वह वृक्ष खड़ा /झूमता /तना हुआ

तुम्हारे लिए

जीवन के सभी मौसम में

तुम बनो नदी




प्रेम के जैसे बरस रही है...


मिट्टी का रंग  पीला  हो  गया
जो सूखा था गीला गीला गया
कनक रंग के दादुर गायें
हँस - हँस  बरसो  बरसा
सावन से पहले अषाढ़ मन हरसा



कहानी

साँझ गुलाबी रिमझिम सिंदूरी बारिश खत लिखे बादलों कागज ने l
काजल गलियाँ आईना वो रंजिशें रक्स साँझा हो गयी फिर चाँद से ll

सबब ज़िल्द पुरानी कहानी किताबों की किस्मत डोरी कच्चे धागों की l
बातें यादों से करती शराफत बिछुड़न तन्हा बेपनाह रस्म नाराजगी की ll

साइकिल की सवारी


अभी मन्दिर में महर्षि सदाफलदेव जी महाराज की भव्य प्रतिमा, भित्ति चित्र, संगमरमर की दीवारों में स्वर्वेद के अंकित दोहे और सीलिंग के खूबसरत झूमरों-डिजाइन ने आकर्षित किया। फिर भी अभी दूर राज्य से दर्शन के लिए तुरत आने लायक नहीं है, अभी निर्माण कार्य चल रहा है। हाँ, आसपास के मित्र एक बार जा कर देख सकते हैं। अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए मन्दिर से खरीद कर एक 'स्वर्वेद' की पुस्तक लाया हूँ। एक महत्वपूर्ण बात यह कि यह किसी देवी, देवता का मन्दिर नहीं, यह एक विशाल ध्यान केंद्र है और यहाँ नशा त्याग, पवित्र भाव से आना है।

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आज के लिए बस इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 22 जुलाई 2024

4194 ...दादा चले गए मात्र अट्ठाईस की उम्र में

सादर नमस्कार



दारिद्रयदहन शिवस्तोत्र
श्रावण मास में प्रतिदिन
भगवान शंकर का पूजन करके
दारिद्रयदहन शिवस्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
इससे शिव की कृपा से दरिद्रता का नाश होता है,
अथाह धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है,
मिलती है आर्थिक संकटों से मुक्ति

विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय
दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥1॥


अब रचनाओं का आस्वादन करें
****


इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेंट्री, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या, अपने-अपने ढोल-मंजीरे ले शरीर के द्वार पर दस्तक देने लगते हैं। वैसे तो अधिकांश लोग अपना ख्याल रखना जानते हैं, फिर भी हिदायतें सामने दिखती रहें तो और भी आसानी हो जाती है, क्योंकि उनके प्रयोग से लाभ ही होता है नुक्सान कुछ भी नहीं है ! मेरे एक मित्र मधुसूदन जी वैद्य हैं। वर्षों से बिना किसी अपेक्षा के लोगों का हितचिंतन करते आ रहे हैं।




दादा चले गए मात्र अट्ठाईस की उम्र में
दादी को सौंपकर उनके हिस्से का अंधेरा




मानो ..
लटके हों
गुच्छ में,
अपने
क्षुप से,
काले-रसीले,
खट्टे-मीठे
मकोय
शुष्क
कवच में .. बस यूँ ही ...




चुप से रहने लगे, गुनगुनाते से वे पल,
खुद में खोए, इठलाते से वो पल,
बड़े बेरंग से, लगने लगे,
रंगी ये साए....






प्रश्न तो कभी कभी
बस होते हैं जरूरी
क्योंकि प्रेमिल संवाद को देते हैं ठौर।
ठीक कुछ ऐसा जैसे मेरे सपनीली
अँधेरी शाम में
तुम हुई थी करीब
खोती हुई चेतना को मेरे कांधे पर रख कर
और मैं महसूस रहा था
उन गर्म सांसों से भरी आहों को



किताबें, जिनसे बचपन में 
बड़ी दोस्ती हुआ करती थी मेरी,
अब अजनबी लगती हैं, 
वे तैयार हैं पढ़े जाने के लिए,
मैंने ही अनदेखी की है उनकी. 



आज बस इतना ही
कल छुटकी श्वेता
सादर

रविवार, 21 जुलाई 2024

4193 ...खुले बदन बारिश में, फिर भीगने की चाहत जागे

 सादर नमस्कार

आज गुरु पूर्णिमा


कल से श्रावण


सबके तन-मन में आग सी लगी है
हर कोई कुछ भी करने- धरने को तैयार
हर मंदिर में सहस्त्रधारा अभिषेक चल रहा है
भीगे वस्त्र में महिलाएं और टॉपलेस पुरुष
बाल्टी भर-भर के जल चढ़ाया जा रहा था
सिंक रही बांटी की महक...
सब प्रतीक्षा में थे कि कब
मंत्रों का समापन हो तो वो सब
भोग लगाएं

अब रचनाओं का आस्वादन करें
****




काश! उसने मुझसे पूछा होता
'तेरी कुड़माई हो गई है ?'
मैं कहती,
"नहीं रे बाबा,
तू करेगा क्या कुड़माई ?



जंगल में सब मस्त है
नहीं पूछता कोई
कौन कौन यहां त्रस्त है।
सभी जानवर प्रतिदिन
नित्य क्रिया में लीन रहते
कुछ जानवर आकर गुफा में विलीन रहते।
शेर कुछ न कुछ नया नियम बनाता
कुछ जानवरों को वो हमेशा डराता।




खुले बदन बारिश में,
फिर भीगने की चाहत जागे,
नदी पहाड़ का खेल है
ज़िन्दगी, उम्र के पीछे भागे,



आदमी
घूमता है
तारा बन

अपने ही
बनाये
सौर मण्डल
में

घूमते घूमते
भूल
जाता है




दुनिया का अंत देखने की चाह में
अनेक चीजों का अंत हुआ
मगर विश्वास सबसे शिखर पर था
तमाम अंत के मध्य।




मूँदे
अपनी
आँखें,
मख़मली
ग़िलाफ़ में
पलकों के,
मिलो ना
कभी हमदोनों,
रहो तुम भी मूक,
घंटों .. रहें हम भी मूक .. बस यूँ ही ...



आज बस इतना ही
सादर

शनिवार, 20 जुलाई 2024

4192 ..राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ

 सादर नमस्कार

एक लम्बे अरसे के बाद
मैं दिग्विजय के नमन

सदा से इस
राष्ट्र के पिता पर्वत हैं
तो माताएँ नदियाँ
****
श्रद्धेय हरि ओम शरण


लगभग भुला दिए गए
प्रचार के अभाव मे नेपथ्य में
26 सितम्बर 1932 को लाहोर (तत्कालीन पंजाब) में जन्म और 
अवसान 75 वर्ष की आयु में 17 दिसंबर 2007 न्यूयार्क में
किसी ने कृपा की कि वे आवाज के माध्यम से आज भी जीवित है
एक भजन सुनिए

आपका दिन शुभ हो
रचनाओं पर एक नज़र



" कुछ नहीं .. बोलेंगे क्या भला ! .. एक "टेट्वैक" का और एक "रैबीवैक्स एस" का 
'इंजेक्शन' अभी दिए हैं .. बारी-बारी से दोनों बाजूओं में .. बाकी .. 
और भी पाँच 'एंटी रेबीज इंजेक्‍शन' लेनी है .. 
अलग-अलग दिनों के अंतराल पर .."




तभी उस कमरे के
सन्नाटे को चीर जाती हैं
दीवार पर लगी घड़ी
 संकेत देती हैं
प्रहर के गुजर जाने का।



ढूंढ रही वह अपना छौना
सूना है आकाश
तारे भी मद्धम दिखते हैं
चंदा हुआ उदास
सपने धूसर सब बेरंगे
कौन भला ये जाने
जिसकी पीड़ा वो ही भुगते
जग तो लगा भुलाने






"ओह दादी !  तेल लगाने से कुछ नहीं होगा । रुको !मैं मोबाइल में गूगल पर सर्च करता हूँ , यहाँ 'नानी दादी के नुस्खे'  में बहुत सारे घरेलू उपाय लिखे रहते हैं, उन्हें पढ़कर आपके  पैरों के दर्द को मिटाने का कोई अच्छा सा उपाय देखता हूँ और वही दवा बनाकर आपके पैरों में लगाउंगा", कहकर अक्षय पुनः मोबाइल में व्यस्त हो गया।




तुम्हारी मंजिल
यदि श्मशान घाट ही है
चाहे वह आज हो या
कुछ वर्षों बाद
तो क्या हासिल किया
एक रहस्य
जो अनाम है

आज बस इतना ही
कल मुलाकात होगी
देवी जी से
सादर

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

4191...सूरज की चमकीली बाँहें..

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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एक बार फिर...
निर्दोष सपूतों के
वीरगति पर आक्रोशित मन
पूछता है स्वयं से प्रश्न 
गगन भेदी जयघोष,
चंद सहानुभूति 
ये रटे-रटाये जुमले 
मात्र औपचारिकता-सी
क्यों प्रतीत हो रही है? 
क्या दैनिक समाचारों का
ब्रेकिंग न्यूज़ बनना  
मुख्य पृष्ठ के किसी कोने में
स्थान पाना 
और नये अपडेट के साथ
भुला दिया जाना ही
शहीदों की नियति है?
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सोचती हूँ

एक शहीद की अंतिम इच्छा

क्या होगी?


#श्वेता
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आज की रचनाएँ-


जीवन क्या है !
उसे उसी वक्त 
ऐसे वैसे दिखाने की क्या जरूरत है !
जो दर्द के गहरे समंदर में होता है, 
उसके आगे तो यूं भी एक एक सच 
हाहाकार करता गुजरता है !
कुछ नहीं दे सकते 
तब कम से कम इतना विश्वास ही दे दो


सावन मनभावन


ओस कणों के संग सुनहली,
उर्मिल देखो क्रीड़ा करती।
सूरज की चमकीली बाँहें,
वसुधा आँगन आभा भरती।
हवा चली है, मन मुकुलित सा
मचल रहा सब कुछ पाने को।


गिरह


नथुनों से उड़ती आँधी
दिमाग़ के कई-कई किंवाड़ तोड़कर 
वर्तमान को गढ़ती  
सपनों पर पड़े निशान ही नहीं 

तुम्हारे वर्चस्व की दौड़ पढ़ाती है 


मुजरिम, वकील जज हम्हीं



मन की कचहरी में मुजरिम वकील जज भी हमीं 
पर सत्य कहने का बता तूं हौसला कहा से लाऊं ।।

 किस यकीं पर उसे अपना कहूं.....
 रोशनी आंखों से छीन ली मेरी जिसने.....।



ज्ञान मीमांसा :अनरसा



 “चलो मान लिया कि तलाक़ का प्रस्ताव तुमने नहीं रखा लेकिन पत्नी को खर्च करने के लिए रुपया नहीं देना पड़े इसलिए तुमने नौकरी से सेवानिवृत्ति ही ले लिया…!”

“हाँ! ना रहेगा बाँस और ना बज सकेगी बाँसुरी..!”

“आजकल जितने महीने शादी के चोंचलें चलते हैं उतने महीने शादी ही नहीं चलती है…!”


चींटी के पर निकलना


हाँ बेटा ! मेहनत भी तभी तो की ना तूने, जब तेरी मम्मी ने तुझे जैसे- तैसे करके यहाँ तक पढ़ाया"। 

"कौन नहीं पढ़ाता आंटी ? आप भी तो पढ़ा ही रहे हो न अपने बच्चों को"।

"माफ करना बेटा ! गलती हो गई मुझसे । बधाई तेरी माँ को नहीं, बस तुझे ही बनती है ।  तेरी माँ ने तो किया ही क्या है , है न ! बेचारी खाँमखाँ मेहनत-मजदूरी करके हड्डी तोड़ती रही अपनी" ।

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में ।
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